धर्मशाला। डा. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज टांडा में जहां मरीज कई सुविधाओं से वंचित हैं, वहीं आगजनी जैसी घटनाओं से निपटने के इंतजाम भी यहां हवा में ही दिख रहे हैं। 500 बिस्तर के विशाल भवन में यदि आग लगने का खतरा हो तो उसे भांपने के लिए लगाए गए स्मोक डिटेक्टर मेडिकल कॉलेज में कोई सिग्नल नहीं देंगे। क्योंकि अस्पताल भवन की छतों पर लगे ये डिटेक्टर काम करने से पहले ही जवाब दे चुके हैं।
सूत्र बताते हैं कि डिटेक्टर लगाते समय ही इसका प्रशिक्षण हुआ था। उसके बाद इन उपकरणों में इंडिकेशन को लगा बलिंग बुझ चुका है। ऐसे में यदि अस्पताल में कोई आगजनी की घटना हो जाए तो पता भी नहीं चलेगा कि धुआं कहां से उठ रहा है? यह वह टांडा मेडिकल कालेज है, जिसे सरकार एम्स स्तर का बनाने का दावा कर रही है। वहीं, पुख्ता सूत्र बताते हैं कि मेडिकल कॉलेज के इस अस्पताल के रखरखाव के लिए मिल रहा बजट ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। जितना मरम्मत बजट इस अस्पताल को जारी हो रहा है, उससे तो अस्पताल के दो वार्ड भी पूरी तरह से दुरुस्त नहीं किए जा सकते हैं। अस्पताल प्रशासन मेडिकल कॉलेज के आला अधिकारियों के सहयोग से सरकार के समक्ष मरीजों से लेकर इस भवन में बेहतर सुविधाओं के क्रियान्वयन के लिए प्रयासरत तो है लेकिन सरकार की तरफ से मिल रही आर्थिक सहायता संतोषजनक नहीं है। बात चाहे सर्द मौसम में एसी की बंद होने की हो या फिर सोलर सिस्टम के जवाब देने की। हर हालत में यहां मरीज, उनके तीमारदार और चिकित्सक ही पिस रहे हैं। ऐसे में जब बात आपातकालीन घटना से निपटने की हो तो पूरे भवन की छतों पर लगे स्मोक डिटेक्टर महज शोपीस का काम कर रहे हैं। बाकायदा रिसेप्शन में इन उपकरणों का कंट्रोल रूम है। इससे यदि आग से कहीं धुआं उठता है तो तत्काल पता चल जाएगा कि आग कहां लगी है और कंट्रोल रूम में लगे माइक से यह सूचित कर दिया जाएगा। लेकिन, लाखों की लागत से लगे ये उपकरण ऐसी घटना से निपटने से पहले ही जवाब दे चुके हैं।
क्या कहते हैं एमएस
टांडा अस्पताल के एमएस डा. दिनेश सूद ने बताया कि स्मोक डिटेक्टर की मररम्त का काम पीडब्ल्यूडी के इलेक्ट्रिकल विंग के अंडर आता है। पीडब्ल्यूडी को इस बारे में अवगत करवाया गया है। जल्द ही स्मोक डिटेक्टर की मरम्मत करवा दी जाएगी।