वर्दी न टाई एडमिशन का पैमाना हो पढ़ाई
प्रवेश के लिए निजी, सरकारी स्कूलों में स्पर्धा, डोर टू डोर छात्रों को ढूंढ रहे अध्यापक
दुविधा में अभिभावक, कहां पढ़ाएं अपने बच्चे
एसडी शर्मा
मैहतपुर (ऊना)।
प्रतिस्पर्धा के इस युग में शिक्षण संस्थानों में ज्यादा से ज्यादा बच्चों को अपने स्कूल में एडमिशन करवाने के लिए निजी और सरकारी स्कूलों का स्टाफ परीक्षा परिणाम आने से पहले ही व्यस्त हो गया है। अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य को लेका चिंतित दिखाई दे रहे हैं। कई अभिभावक निजी स्कूलों की मंहगी पढ़ाई को लेकर परेशान हैं तो कोई स्कूलों में पढ़ाई न होने से परेशान है। कई अभिभावक इसलिए परेशान हैं कि उनके बच्चों को बहुत अधिक होमवर्क दे दिया जाता है तो कुछ इसलिए दुखी हैं कि उनके बच्चों को होमवर्क दिया ही नहीं जाता। हालात ये हैं कि हर दूसरा अभिभावक अपने नौनिहालों के भविष्य को लेकर परेशान है। कई निजी स्कूलों के टीचरों की परेशानी बच्चों की बढ़ती तादात को लेकर है तो कई निजी एवं सरकारी स्कूलों के टीचर छात्रों को निरंतर घट रही संख्या से परेशान हैं। कई सरकारी स्कूलों में शिक्षा विभाग ने निजी स्कूलों को टक्कर देने के लिए बच्चों की वर्दी तक का रंग बदल डाला। बच्चे स्मार्ट नजर आएं इसके लिए नौनिहालों के गले में टाई लगवाई। नया सत्र शुरू होने को है, कई स्कूलों में परीक्षाएं चल रही हैं, ऐसे में कई स्कूलों के टीचरों ने नए एडमिशन के लिए डोर टू डोर दस्तक देना शुरू कर दिया है। ज्यादा से ज्यादा बच्चों को अपने स्कूल में लाने को प्रयास तेज हो गए हैं।
अभिभावकों ने भी नए एडमिशन के लिए अपने बच्चों के बेहतर भविष्य को ध्यान में रखकर उन स्कूलों की खोज शुरू कर दी हैं जो न केवल अनुशासन, पढ़ाई एवं संस्कारों के लिहाज से बेहतर हों, बल्कि वित्तीय तौर पर भी ज्यादा मंहगे न हों। अभिभावक राजेश कुमार, लखविंदर सिंह, दीदार, जगदीश, सरवण कुमार, सरोज, कुसुम, रेखा, सलोचना, सीमा तथा सुषमा ने कहा कि स्कूल जो भी हो, जब तक घर में पढ़ाई नहीं करवाएंगे बच्चा चल नहीं सकता। जितना बड़े नाम वाला स्कूल अभिभावकों की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी।
सरकारी स्कूलों में निशुल्क वर्दी, किताबें, मिड डे मील, नाममात्र को फीस, निर्धनों को छात्रवृत्ति मिलने के बावजूद लोग सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई से कन्नी काटते नजर आ रहे हैं।
उपनिदेशक शिक्षा एलिमेंटरी हंसराज गुलेरिया ने कहा कि सरकारी स्कूलों के स्टाफ को निर्देश दिए जा रहे हैं कि वे गांवों में अभिभावकों से संपर्क कर ज्यादा से ज्यादा बच्चों को सरकारी स्कूलों में एडमिशन लेने के लिए प्रेरित करें।