मैहतपुर (ऊना)।
ऊना विधानसभा हलके के सरहदी क्षेत्र मैहतपुर-बसदेहड़ा का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सीएचसी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बनने को तरस गया है। हैरत की बात यह कि स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का दर्जा बढ़ाने को लेकर किसी सियासी दल के नेता को तरस नहीं आया। इलाके के सबसे पुराने पीएचसी में वर्तमान में कई गांवों के लोग अपना उपचार के लिए आते हैं। यहां पर अनेक तरह के छोटे-छोटे टेस्ट भी निशुल्क किए जाने की सुविधा जनता को मिल रही है।
ओपीडी का स्तर भी अन्य पीएचसी से बेहतर है, बावजूद इसके आज दिन तक बसदेहड़ा पीएचसी को सीएचसी का दर्जा देने की दिशा में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सियासी दलों ने कोई कदम नहीं उठाए हैं। नगर परिषद ने पिछले साल 15 जून 2016 को एक प्रस्ताव पारित कर राज्य सरकार को भेजा था। इसी साल फरवरी में फिर एक प्रस्ताव के जरिये नगर परिषद ने बसदेहड़ा पीएचसी का दर्जा बढ़ाकर सीएचसी करने की मांग प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री कौल सिंह के समक्ष रखी लेकिन कोई गौर न हुआ।
पीएचसी को बसदेहड़ा निवासी पंडित रामकृष्ण भारद्वाज ने लाहौर में अपने कुछ सहयोगियों की मदद से 1937 में स्वास्थ्य सेवाएं देने की शुरूआत की थी। करीब 47 साल बाद 1984 में इसे सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य बनाया और आज करीब 33 साल बाद भी यह अपग्रेड होने का तरस रहा है। लोगों नरेश कुमार, सुभाष चंद, मनोज कुमार, सीमा, रेखा, सावित्री, सुलोचना देवी, दीपक, राजेश, श्याम कुमार, शिवदत्त वशिष्ठ ने कहा कि भाजपा एवं कांग्रेस दोनों दलों के नेताओं ने इस ओर कभी गौर नहीं किया और न ही इलाके के लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करवाने को लेकर कोई खास रुचि दिखाई।
भाजपा विधायक ने नहीं उठाया मामला : रायजादा
कांग्रेस प्रत्याशी सतपाल रायजादा ने कहा कि पिछले 15 सालों से ऊना हलके से भाजपा विधायक सतपाल सत्ती ने क्यों नहीं इस मसले को उठाया। उन्हें जनता को जवाब देना चाहिए। वह कौन सा विकास करते रहे, जनता के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने के लिए बसदेहड़ा पीएचसी को सीएचसी बनाने के लिए उन्होंने क्या योगदान दिया।
कांग्रेस सरकार ने जानबूझ कर ऊना से किया भेदभाव : सत्ती
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष एवं निवर्तमान विधायक सतपाल सत्ती ने कहा कि नगर परिषद बार-बार प्रस्ताव भेज रही है और मुख्यमंत्री एवं प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री उन प्रस्तावों का कोई गौर ही नहीं कर रहे। इससे पता चलता है कि ऊना चुनाव क्षेत्र के साथ जानबूझ कर भेदभावपूर्ण रवैया अपनाए रखा गया। इसी के चलते पीएचसी का बसदेहड़ा का दर्जा नहीं बढ़ पाया।