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अब चायल और कंडाघाट भी में उगाएं स्कारलेट स्पर सेब

Sat, 16 Jul 2016 10:18 PM IST
ब्यूरो, सोलन
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जिले के मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्र कंडाघाट के चायल, मही, बाशा, जुब्बड़हट्टी और कसौली के किसान अब सेब उत्पादन की तरफ अग्रसर हो सकते हैं। - फोटो : अमर उजाला
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जिले के मध्यवर्ती पहाड़ी क्षेत्र कंडाघाट के चायल, मही, बाशा, जुब्बड़हट्टी और कसौली के किसान अब सेब उत्पादन की तरफ अग्रसर हो सकते हैं। नौणी विवि के कृषि विज्ञान केंद्र कंडाघाट ने इन क्षेत्रों के लिए सेब की अर्ली वैरायटी की तीनों संशोधित किस्में अर्ली रेडवन, स्कारलेट स्पर और गेल गाला को तैैयार किया है।
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वैज्ञानिकों का कहना है कि मध्यवर्ती क्षेत्रों में इन तीनों प्रजातियों के सेबों की पैैदावार सफल साबित हुई। इसके अलावा सुपरचीफ, डोरोमाइन, रेड विलोकस किस्म की प्रजाति को सुधारने के प्रयोग भी सफल रहे हैं। यह किस्में भी मध्यवर्ती ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। वर्तमान में सोलन के इन क्षेत्रों में फूल, सब्जियों और टमाटर की पैदावार तक किसान समिति हैं।
वर्ष 2009 में कृषि विज्ञान केंद्र कंडाघाट में उद्यान विभाग के माध्यम से 6 किस्मों को रोपित किया था। इसमें तीन किस्में वातावरण के अनुकूल पाई गईं। इसके सफल उत्पादन के बाद अब विभाग मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों के बागवानों को इन्हें उगाने के लिए प्रेरित कर रहा है। इन किस्मों को उगाने से कम शीत वाले क्षेत्रों में सेब उगाने की संभावनाएं प्रबल हुई हैं। बागवानी के तहत अतिरिक्त क्षेत्र भी इसके तहत लाया जा सकेगा।
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अब सेब का उत्पादन संभव : जीडी शर्मा
कृषि विज्ञान केंद्र डेढ़घराट डॉ. जीडी शर्मा ने बताया कि सोलन के संबंधित क्षेत्रों में सेब का उत्पादन नहीं होता  है। लेकिन नई किस्मों के आने से प्रदेश के मध्य ऊंचाई वाले इन क्षेत्रों में सेब की बागवानी सफलतापूर्वक की जा सकेगी। किसानों और बागवानों की विधिकरण की तरफ भी प्रेरित किया जा रहा है। अगले वर्ष से बागवान इन किस्मों की पौध हासिल कर सकते हैं। कंडाघाट के चायल, मही, बाशा, कसौली और जुब्बड़हट्टी क्षेत्रों में इन्हें आसानी से उगाया जा सकता है। इनके परिणाम सफल रहे हैं। विज्ञान केंद्र में वर्ष 2009 में इन्हें लगाया था और 2011 में इनमें फल लग गए। मध्यवर्ती क्षेत्रों के किसान बंदरों के नुकसान के डर से सेब उत्पादन के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ रहे।
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