कारगिल के वीर सपूत के नाम पर स्कूल, सड़क, गैस एजेंसी और डिस्पेंसरी
9 जुलाई 1999 को दिया था बलिदान
संवाद न्यूज एजेंसी
रामशहर (सोलन)। कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले नालागढ़ के पंदल गांव के वीर सपूत राइफलमैन प्रदीप कुमार को क्षेत्र आज भी गर्व और सम्मान के साथ याद करता है। कारगिल विजय दिवस पर उनके बलिदान को नमन करते हुए स्थानीय लोगों ने कहा कि प्रदीप कुमार केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि देशभक्ति, साहस और समर्पण के प्रतीक हैं।
राइफलमैन प्रदीप कुमार 9 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर में मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। उनकी शहादत के बाद पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई थी, लेकिन लोगों को इस बात का गर्व भी था कि उनके गांव का बेटा देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर अमर हो गया।
शहीद की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके नाम पर कई विकास कार्य किए गए। बड़ोखर स्कूल को मिडिल से हाई स्कूल का दर्जा देकर उनका नाम दिया गया। एक सड़क का नामकरण भी शहीद प्रदीप कुमार के नाम पर किया गया। रामशहर में उनके नाम से भारत गैस एजेंसी संचालित की जा रही है, जिससे कई लोगों को रोजगार मिल रहा है। वहीं बदोखर में उनके नाम पर एक डिस्पेंसरी भी स्थापित की गई है।
स्थानीय निवासी बलवीर कुमार ने बताया कि जब शहीद प्रदीप कुमार का पार्थिव शरीर गांव लाया गया था, तब नालागढ़ से रामशहर तक सड़कों के दोनों ओर छात्र-छात्राएं और हजारों लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए खड़े थे। पूरा क्षेत्र भारत माता के जयघोष और देशभक्ति के नारों से गूंज उठा था। उन्होंने बताया कि प्रदीप कुमार पढ़ाई के साथ-साथ सेना में भर्ती की तैयारी करते थे और वॉलीबाल के अच्छे खिलाड़ी भी थे। उनका हंसमुख स्वभाव और मेहनती व्यक्तित्व आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवंत है।
शहीद के पिता जगन्नाथ कौशल ने भावुक होकर कहा कि उन्हें अपने बेटे के बलिदान पर गर्व है। उन्होंने कहा कि प्रदीप ने देश, क्षेत्र और परिवार का नाम रोशन किया। हालांकि दोनों बेटों को खोने का दर्द आज भी उनके दिल में कायम है।
जंग में पोस्ट तबाह, पत्थरों की ओट में बिताए कई दिन
नालागढ़ (सोलन)। कारगिल युद्ध के दौरान 9 डोगरा रेजिमेंट में तैनात रहे हवलदार गुरबक्श सिंह चंदेल ने द्रास सेक्टर में युद्ध के भयावह अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि दुश्मन के भीषण हमले में उनकी पोस्ट संख्या 5240 पूरी तरह तबाह हो गई थी। आर्टिलरी गन से दागे गए गोले के टुकड़े उनकी टांग में लगे, जिससे तीन स्थानों पर फ्रैक्चर हो गया।
उन्होंने बताया कि पोस्ट नष्ट होने के बाद कई दिनों तक पत्थरों की ओट में रहकर मोर्चा संभालना पड़ा। कई बार राशन समाप्त हो जाता था और नई आपूर्ति पहुंचने में 20 से 25 घंटे लग जाते थे। दुश्मन ऊंची चोटियों पर तैनात था, जिससे लगातार गोलाबारी और पत्थर गिरने का खतरा बना रहता था। गुरबक्श सिंह ने कहा कि विषम परिस्थितियों के बावजूद भारतीय सैनिकों का मनोबल कभी नहीं टूटा और अंततः देश ने विजय हासिल की। संवाद