खुंब निदेशालय सोलन में तैयार की बीमारी को लेकर एक अलग यूनिट
लाइव देख सकेंगे मशरूम लगने वाली बीमारियों को, मिलेगा सटीक समाधान
वैज्ञानिकों ने करीब 10 प्रकार की बीमारियों के नमूनों को रखा लैब में
ललित कश्यप
सोलन। देशभर के उत्पादकों को खुंब अनुसंधान निदेशालय सोलन में मशरूम में लगने वाली विभिन्न बीमारियों और उनकी रोकथाम के उपायों की सटीक जानकारी एक ही छत के नीचे मिल सकेगी। निदेशालय परिसर में मशरूम रोगों को समर्पित एक विशेष और अत्याधुनिक यूनिट तैयार की गई है, जिसकी मदद से देशभर के किसान व उत्पादक बीमारियों का लाइव मुआयना कर सकेंगे।
मशरूम की खेती को फफूंद, बैक्टीरिया और कीट-व्याधियों से भारी नुकसान पहुंचता है। कई बार सही समय पर पहचान न हो पाने के कारण पूरी फसल बर्बाद हो जाती है। इस समस्या से निजात दिलाने के लिए डीएमआर के पूर्व निदेशक डॉ. वीपी शर्मा के कार्यकाल के दौरान उनके प्रयासों से इस नई यूनिट की लैब को स्थापित किया था। इसमें करीब 10 प्रकार की प्रमुख बीमारियों के सजीव और संरक्षित नमूने रखे हैं। इन नमूनों के जरिये ग्रोवर यह स्पष्ट रूप से देख और समझ सकेंगे कि कौन सा रोग लगने पर मशरूम और कंपोस्ट में किस तरह के लक्षण दिखाई देते हैं। इस विजुअल और लाइव ट्रेनिंग सेटअप से उत्पादकों को फील्ड स्तर पर आने वाली अड़चनों को दूर करने में खासी मदद मिलेगी।
इनसेट
मशरूम में लगने वाली प्रमुख बीमारियां
मशरूम की खेती विशेषकर बटन मशरूम में ग्रीन मोल्ड, वेट बबल, ड्राई बबल, बैक्टीरियल ब्लॉच और वेब मोल्ड जैसी बीमारियां सबसे ज्यादा तबाही मचाती हैं। ग्रीन मोल्ड कंपोस्ट पर हरे रंग के फफूंद के रूप में फैलती है, जो माइसीलियम को नष्ट कर देती है। बबल बीमारियां के संक्रमण से मशरूम का आकार विकृत हो जाता है और उस पर भूरे रंग के धब्बे या फफोलानुमा उभार आने लगते हैं। बैक्टीरियल ब्लॉच मशरूम कैप पर पीले या हल्के भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, जिससे फसल की बाजार में कीमत गिर जाती है।
कोट
खुंब अनुसंधान निदेशालय सोलन के कार्यकारी निदेशक डॉ. बृज लाल अत्री ने बताया कि मशरूम उत्पादन में किसानों को अक्सर रोगों की पहचान न होने के कारण भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है। इसी को ध्यान में रखते हुए निदेशालय में यह विशेष यूनिट स्थापित की गई है। इसमें प्रमुख बीमारियों के लाइव नमूने प्रदर्शित किए गए हैं, ताकि देश भर से आने वाले उत्पादक और युवा उद्यमी रोगों के लक्षणों को बारीकी से समझ सकें। इससे वे अपनी फसल को समय रहते बचा सकेंगे और देश में मशरूम उत्पादन की गुणवत्ता व मात्रा दोनों में सुधार होगा।