चायल (सोलन)। उतरी भारत के प्रसिद्ध और नव वर्ष के पहले त्योहार को चायल क्षेत्र में बड़े पारंपरिक रूप से मनाया गया। इस अवसर पर स्थानीय बच्चों ने सुबह से देर शाम तक चायल से सटे क्षेत्र मिहानी राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल, वन प्रशिक्षण संस्थान, पैलेस होटल, स्थानीय लोअर बाजार, अपर बाजार की दुकानों और घरों में जाकर लोहड़ी मांगी।
छोटे-छोटे बच्चों आर्यन, अभीक, आदर्श, हार्दिक, चीलू, चीटकू, नैंसी, नन्नू, अब्बू की टोलियों ने सुंदर मुंदरिये गाकर लोगों से लोहड़ी मांगी। गुरुद्वारा साहिब चायल के सेवादार प्रीतपाल सिंह व रामना पंजाब के सतपाल ने चायल के लोगों को लोहड़ी के इतिहास के बारे में बताया। मुगल शासक के राज के दौरान पंजाब के पट्टी गांव में हिंदू परिवार की दो बेटियां सुंदरी और मुंदरी पर गांव के तहसीलदार नवाब खां की बुरी नजर थी। उसने मकर संक्रांति वाले दिनों में उठाकर शादी करने का एलान गांव में कर दिया।
इस पर गांव वालों ने गांव के दुल्ला सरदार सिख से गुहार लगाई जिससे पूरा गांव और तहसीलदार नवाब खां भी डरता था। उसने बेटियों के हिंदू पिता से कहा कि वे दोनों के लिए योग्य वर तलाश कर उनकी शादी करवा दूंगा। गांव वाले शीघ्र ही दो वर तलाश किए जिसमें दुल्ला ने मकर संक्रांति के एक दिन पहले गांव के चौराहे में सरेआम अग्नि जलाकर लड़कियों का विवाह करवा दिया। तब से पंजाब के हिंदू हर मकर संक्रांति से एक दिन पहले चौराहे पर आग जलाकर सिखों का धन्यवाद करते हैं। दुल्ला सरदार को यह गीत गाकर सुंदरिये मुंदरिये, ओ तेरा कौन सहारा, ओ दुल्ला पट्टी वाला ओ, दुल्ले ने धी ब्याही ओ झोली शक्कर पाई ओ... याद करते हैं।