उद्योगपतियों ने कहा कि क्राफ्ट पेपर के अलावा गोंद, सिलाई तार, रंग, माल ढुलाई, एलपीजी और मजदूरी की लागत में भी भारी वृद्धि हुई है। इसके बावजूद ग्राहक कंपनियां पुराने दरों पर ही माल की आपूर्ति करने का दबाव बना रही हैं। वे कीमतों में किसी भी तरह की बढ़ोतरी करने को तैयार नहीं हैं। उद्योगपति जुलाई से ही भारी नुकसान उठा रहे हैं, लेकिन अब घाटे में उत्पादन जारी रखना संभव नहीं रह गया है। उद्योगपतियों के अनुसार कारखानों में पेपर का पुराना स्टॉक खत्म हो चुका है। बढ़ी हुई कीमतों पर नया पेपर खरीदने की आर्थिक क्षमता भी नहीं बची है। कच्चे माल की कमी के कारण मजदूर काफी समय से खाली बैठने को मजबूर हैं। एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने बताया कि दो-तीन दिन पहले हरियाणा के सोनीपत में उत्तर भारत के छह राज्यों के गत्ता उद्योगपतियों की बैठक हुई थी।
इसमें करीब 250 गत्ता फैक्ट्रियों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। बैठक में हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसमें सामने आया कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का संकट पूरे उत्तर भारत के गत्ता उद्योग के सामने है। महापंचायत में छह राज्यों के अध्यक्षों ने छह दिन तक पेपर मिलों से खरीद नहीं करने का निर्णय लिया था। साथ ही फैक्ट्रियों में उत्पादन सीमित करने पर भी सहमति बनी थी। गत्ता उद्योग संघ के प्रदेशाध्यक्ष हेमराज चौधरी ने कहा कि बैठक में कड़े निर्णय लिए गए हैं।
इसके तहत 14 से 18 अक्तूबर तक प्रदेश के सभी गत्ता उद्योग पूरी तरह बंद रहेंगे। इस अवधि में न तो उत्पादन होगा और न ही किसी कंपनी या ग्राहक को माल की आपूर्ति की जाएगी। उन्होंने कहा कि पेपर का स्टॉक खत्म हो चुका है। बंदी के दौरान पेपर मिलों से बढ़ी हुई कीमतों पर क्राफ्ट पेपर की खरीद नहीं की जाएगी। यदि कोई कच्चा माल लेकर आता है, तो उसे भी खाली नहीं किया जाएगा। बैठक में एसोसिएशन के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सुरेंद्र जैन और उद्योगपति मुकेश जैन भी मौजूद रहे।
कीमतें बढ़ने के आसार
उद्योगपतियों ने स्पष्ट किया कि बढ़ती लागत के अनुरूप उत्पादों की कीमतों में उचित बढ़ोतरी होने तक घाटे में काम करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि बंदी की अवधि बढ़ाई भी जा सकती है। यदि ग्राहक कंपनियां समय रहते कीमतों में संशोधन नहीं करती हैं, तो उद्योगों के सामने संकट और गहरा सकता है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में उद्योगों को हो रहे नुकसान की जिम्मेदारी बाजार की स्थिति और कीमतों में बढ़ोतरी स्वीकार नहीं करने वाली ग्राहक कंपनियों की होगी।