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जानिए, कैसे मौत का मंजर पार कर गए छह बच्चे!

Mon, 03 Jun 2013 09:03 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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हिमालय की हाड़ कंपा देने वाली बर्फीली हवाएं। बर्फ से ढके पहाड़ों के दुर्गम रास्ते। राह में जगह-जगह मौत का मंजर।
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यह सब देखकर किसी के भी कदम रुक सकते हैं, लेकिन अपने बेमिसाल जज्बे के बूते 15 से 17 साल की उम्र वाले
छह स्कूली छात्रों ने इस सबके बावजूद दुनिया की सबसे ऊंची चोटी ‘माउंट एवरेस्ट’ पर झंडा गाड़कर नया इतिहास रचा।

दल का दावा है कि राघव जुनेजा सबसे कम उम्र में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाला पर्वतारोही है। हिमाचल प्रदेश के बोर्डिंग स्कूल सनावर के इन छह छात्रों ने 21 मई को एवरेस्ट पर झंडा फहराया।

सोमवार को छात्रों की यह टीम दिल्ली पहुंची और अपने अनुभव साझा किए। इनमें पांच छात्र 12वीं कक्षा के और एक 10वीं का है। छात्रों में पृथ्वी सिंह चाहल, फतेह सिंह बराड़ व जी. सिंह पंजाब से हैं, जबकि अजय सोहल हिमाचल प्रदेश, शुभम कौशिक दिल्ली और राघव जुनेजा उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद का रहने वाला है।
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राघव इस दल में सबसे छोटा है, जिसकी उम्र महज 15 साल सात महीने है। छात्रों ने बताया कि उन्होंने जो सोचा था, चढ़ना उससे ज्यादा मुश्किल था। कई बार ऐसा मौका आया जब वे डर गए। रास्ते में उन्हें एक पर्वतारोही की शव भी मिला पर वे रुके नहीं। एक मौका ऐसा भी आया जब साथी शुभम फिसलकर करीब 10 फीट नीचे चला गया, लेकिन टीम वर्क से उसे बचा लिया गया।

पर्वतारोही दल के अनुसार, अप्रैल में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने की योजना बनी। सभी बच्चों ने दार्जिलिंग स्थित हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट से बेसिक कोर्स किया। सेना के साथ सभी पहले लद्दाख में खरदुंगला दर्रे तक गए। दल 19 अप्रैल को नेपाल स्थित बेस कैंप पहुंचा। चढ़ाई के दौरान 20 मई को ये बच्चे कैंप चार पहुंचे। 21 मई को माउंट एवरेस्ट पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया गया।

एवरेस्ट चढ़ाई की कहानी-बच्चों की जुबानी:
राघव जुनेजा:अपने दल में मै सबसे छोटा हूं। मुझे चढ़ाई के दौरान कहीं डर नहीं लगा। टीम वर्क के साथ काम करने से हिम्मत मिलती गई और हम आगे बढ़ते गए। कम उम्र में ऊंची चोटी पर चढ़ाई करके अच्छा लग रहा है।
फतेह सिंह: हम लगातार एक-दूसरे के साथ चढ़े जा रहे थे। रास्ते में मुझे एक शव मिला जो दस घंटे से वहीं पड़ा था। मुझे थोड़ा डर लगा पर साथियों और शेरपा की मदद से फिर आगे बढ़ते गए।

शुभम कौशिक: चढ़ाई के दौरान मुश्किल है अपने स्टेमिना को बचाए रखना। इस दौरान आपको चढ़ाई के साथ अपने सारे काम खुद करने होते हैं। मौसम बेहद ठंडा रहता है, जिसमें अपने को ढालना सबसे मुश्किल होता है।

गुरबिदत सिंह: जैसे-जैसे ऊपर चढ़ाई करते हैं, काम कठिन होता जाता है। चढ़ाई की मुश्किल बढ़ती है, साथ ही थकान भी। इस दौरान टीम वर्क के साथ पूरे हिम्मत से ही आगे बढ़ा जा सकता है।
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पृथ्वी सिंह: खाने-पीने के लिए आपके पास ज्यादा विकल्प नहीं होते। आपको चॉकलेट मिलते हैं। चावल या नूडल्स खाने को मिलते हैं, मगर थकान व स्टेमिना बढ़ाने के लिए यह काफी नहीं है। पानी ज्यादा से ज्यादा रखना अक्लमंदी होती है।

अजय सोहल: हम लगातार आगे बढ़ते रहे। जो हमने 5-6 घंटे में पार कर लिया, वे अनुभवी लोग 7 घंटे से ज्यादा लगाते रहे। यह हमारे दल का प्लस प्वाइंट था।
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