तहसील नाहन के भोगपुर-सिंबलवाला में 48 बीघा पैतृक संपत्ति से जुड़ा मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने वर्ष 2008 से चले आ रहे पैतृक संपत्ति विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सरदारी देवी की सिविल अपील खारिज कर दी। न्यायाधीश गौरव महाजन ने निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि 29 मई 2001 की वसीयत संदेहास्पद परिस्थितियों में तैयार की गई थी, जबकि 9 दिसंबर 1987 की वसीयत ही दिवंगत मंगू राम की अंतिम वैध वसीयत मानी जाएगी।
यह मामला तहसील नाहन में मंगू राम की करीब 48 बीघा भूमि से जुड़ा था। उनकी तीन बेटियों ने आरोप लगाया था कि पिता की वृद्धावस्था और निर्भरता का लाभ उठाकर उनकी बहन सरदारी देवी और उनके पति ने वर्ष 2001 में पूरी संपत्ति अपने नाम करवा ली। उनका कहना था कि इससे पहले वर्ष 1987 में मंगू राम ने अपनी चारों बेटियों और एक नाती के पक्ष में वसीयत की थी। अपील में सरदारी देवी ने दावा किया कि वह अपने पिता की देखभाल करती थीं, इसलिए मंगू राम ने स्वेच्छा से बाद की वसीयत उनके पक्ष में की थी। हालांकि अदालत ने पाया कि वसीयत के समय लाभार्थी स्वयं मौजूद थीं। गवाह उनके परिवार से निकट संबंध रखते थे और अन्य बेटियों को संपत्ति से पूरी तरह वंचित करने का कोई ठोस कारण वसीयत में दर्ज नहीं था।
अदालत ने यह भी माना कि मंगू राम पहले ही सरदारी देवी को लगभग 38 बीघा भूमि दे चुके थे। ऐसे में शेष संपत्ति से अन्य बेटियों को पूरी तरह अलग करने का पर्याप्त औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सका। इसलिए वर्ष 2001 की वसीयत तथा उसके आधार पर की गई नामांतरण (म्यूटेशन) कार्रवाई को वैध नहीं माना गया। न्यायालय ने सरदारी देवी की सिविल अपील लागत सहित खारिज कर दी और 6 अगस्त 2025 को निचली अदालत (सीनियर सिविल जज) के निर्णय को यथावत बनाए रखा।-