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पुश्तैनी काम को आज भी अमरपुर निवासी रखे हुए हैं जिंदा
पंकज तन्हा
नाहन (सिरमौर)। दिवाली पर बिकने वाले मिट्टी के दीयों-बर्तनों का स्थान बेशक चाइना निर्मित दीये और बर्तनों ने ले लिया हो, मगर आज भी बाजार में स्वदेशी मिट्टी से बने दीये और बर्तनों की मांग है।
नाहन में भी ऐसे कई परिवार हैं जो दशकों से पुश्त दर पुश्त मिट्टी के दीये और बर्तन बना रहे हैं। इनमें अमरपुर निवासी संजीव कुमार का परिवार भी ऐसे ही परिवारों में शामिल है। संजीव कुमार बचपन से ही रंग बिरंगे मिट्टी के मटके, गुल्लक, करबे, दीये, गड़बड़ों को बना कर इस बेहतरीन कला को जिंदा रखे हुए हैं। मिट्टी के बनाए इन्हीं बर्तनों से होने वाली कमाई इस परिवार के भरण पोषण का सहारा है।
47 वर्षीय संजीव कुमार बचपन से ही मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। इनके पिता स्वर्गीय दीपचंद व माता रोशनी देवी को मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य विरासत में मिला था। संजीव कुमार ने होश संभालते ही इस कार्य में अपने माता-पिता का हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। आज इस कार्य को करते हुए संजीव कुमार को चार दशक बीत चुके हैं।
संजीव कुमार की पत्नी रीना देवी, बेटा नितिन कुमार, बेटी शिखा व कनिष्का भी इस कार्य में सहयोग दे रहे हैं।
संजीव कुमार ने बताया कि उनका ये पुश्तैनी धंधा है। बेशक, बाजार में स्टील व दूसरी धातुओं से बने बर्तनों ने मिट्टी से बने बर्तनों का धंधा चौपट कर दिया है। इसके बावजूद वह इन्हीं मिट्टी के बर्तनों को बनाकर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। दिवाली पर बनाए बर्तनों से अच्छी आय हो जाती है। उनके बनाए बर्तनों की आज भी बाजार में मांग है। उन्होंने बताया कि दिवाली पर मांग अधिक होने के कारण उनके परिवार का हर सदस्य इस कार्य में उनका हाथ बंटाता है। वह मिट्टी के बर्तन बनाते हैं तो अन्य सदस्य उनको रंगने का कार्य करते हैं।
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एक इतिहास बन जाएंगे मिट्टी के बर्तन
संजीव कुमार ने दुखी मन से कहा कि कला का ये बेजोड़ रंग शायद आने वाले समय में देखने को न मिले। मुझे लगता है आने वाली पीढ़ी के लिए मिट्टी के मटके, दीये, गुल्लक शायद किताबों या दादी-नानी की कहानियों तक ही सिमट कर रह जाएं। उन्होंने सरकार से इस कला को जिंदा रखने के लिए कोई योजना तैयार करने की मांग की है।