संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। हिमाचल प्रदेश पुरानी पेंशन बहाली संघर्ष समिति ने 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर टेट की अनिवार्यता को मौलिक अधिकारों का हनन बताया है। प्रेस को जारी बयान में समिति के प्रदेश अध्यक्ष मायाराम शर्मा ने कहा कि 2010 से पूर्व नियुक्त सेवारत शिक्षकों की टेट परीक्षा से नहीं, प्रशिक्षण कार्यशाला एवं नई तकनीक सीखने से बच्चों को पढ़ाने के लिए दक्षता और गुणवत्ता आएगी।
उन्होंने कहा कि एनसीटीई के दिशा निर्देशानुसार टेट की शर्त आरटीई एक्ट 2009 के बाद सरकारी विद्यालय में नियुक्त होने वाले अध्यापकों के लिए जरूरी की गई थी लेकिन अब यह शर्त 2010 से पूर्व नियुक्त अध्यापकों के ऊपर भी थोपी जा रही है जो कि अध्यापकों के मौलिक अधिकारों का हनन, भर्ती के नियमों की अवहेलना और कार्यरत अध्यापकों का मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का प्रयास है।
ऐसे में उम्र की इस दहलीज पर खड़े उस शिक्षक की मन:स्थिति को कौन समझेगा, जिसने अपने जीवन के 25-30 वर्ष देश के बच्चों का भविष्य संवारने में लगा दिए हैं। अब फिर से परीक्षा का कहा जा रहा है अन्यथा नौकरी समाप्त कर दी जाएगी। इससे बड़ी विडंबना, इससे बड़ा अन्याय और इससे बड़ा मानसिक उत्पीड़न शायद किसी कर्मयोगी के साथ नहीं हो सकता। जिस शिक्षक ने उस समय की सभी सेवा शर्तों को पूरा करके वैधानिक रूप से नियुक्ति प्राप्त की, जिसने वर्षों तक ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन किया, आज उसी पर पूर्वव्यापी रूप से नए नियम थोपना अन्याय है। हिमाचल प्रदेश के हजारों शिक्षकों को इससे परेशानी का सामना करना पड़ रहा है उनको अपना भविष्य अंधकार में दिखाई दे रहा है। ऐसा होने से वह अवसाद जी रहे हैं।
पुरानी पेंशन बहाली संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष मायाराम शर्मा ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री से निवेदन किया है कि इस संदर्भ में मानसून सत्र में अध्यादेश लाकर लाखों अध्यापकों को इस टेट की शर्त से छुटकारा दिलाने का प्रयास करें।