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Sirmour News: दुष्कर्म मामले में दोषी किशोर को मां की देखरेख में रिहाई

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किशोर न्याय बोर्ड ने सजा पर अपनाया सुधारात्मक दृष्टिकोण
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दुष्कर्म और पोक्सो में दोषी की सजा दंड की बजाय परिवीक्षा में बदली, अपहरण के आरोपों से बरी
दीपक मेहता

नाहन (सिरमौर)। नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) ने बड़ा फैसला सुनाया है। प्रधान मजिस्ट्रेट विकास कपूर की अध्यक्षता वाले किशोर न्याय बोर्ड ने दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के तहत किशोर को दोषी करार देने के बावजूद सजा को परिवीक्षा में बदल दिया है।
आरोपी के नाबालिग होने और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए बोर्ड ने उसे एक वर्ष की अवधि के लिए उसकी मां की देखरेख में अच्छे आचरण की परिवीक्षा पर रिहा करने के आदेश दिए हैं। अधीक्षक-सह-परिवीक्षा अधिकारी को आरोपी की नियमित निगरानी और मार्गदर्शन सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि एक वर्ष की अवधि पूर्ण होने के बाद प्रगति रिपोर्ट तलब की जाएगी।
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यह मामला 8 फरवरी 2022 को शिलाई थाने में दर्ज हुआ था। पीड़ित के पिता ने शिकायत में आरोप लगाया था कि उनकी नाबालिग बेटी को आरोपी बहला-फुसलाकर पांवटा साहिब ले गया। वहां उनके बीच यौन संबंध बने। पुलिस ने आईपीसी की धारा 363 और 376 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत मामला दर्ज कर आरोप पत्र अदालत में पेश किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने मामला साबित करने के लिए 23 गवाहों के बयान दर्ज कराए।
हालांकि, सामाजिक अन्वेषण रिपोर्ट (एसआईआर) में आरोपी के किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल होने के प्रमाण नहीं मिले। साक्ष्यों के आधार पर बोर्ड ने माना कि कथित घटना के समय पीड़िता की आयु 16 वर्ष और आरोपी की आयु 15 वर्ष थी। आदेश में कहा गया कि संबंध सहमति से थे, लेकिन कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु की लड़की के साथ सहमति से बने शारीरिक संबंध भी दुष्कर्म की श्रेणी में आते हैं। किशोर न्याय प्रणाली के तहत दंड के बजाय सुधार को प्राथमिकता देते हुए आरोपी को मां की निगरानी में रखने और अच्छे आचरण की शर्त पर रिहा करने का निर्णय लिया गया। हालांकि, अपहरण के आरोप में पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर आरोपी को उस आरोप से बरी कर दिया गया।
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घटना के समय आरोपी भी था नाबालिग
बोर्ड ने आदेश में उल्लेख किया कि घटना के समय आरोपी स्वयं भी नाबालिग था। इसलिए यह मामला सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए उपयुक्त है। इस फैसले को किशोर न्याय व्यवस्था में सुधारात्मक न्याय की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
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