शिलाई (सिरमौर)। गिरिपार क्षेत्र का सबसे खर्चीला माघी पर्व सोमवार को धूमधाम से शुरू हुआ। लोगों ने यहां बकरे काट कर इस पर्व का आगाज किया। सुबह के समय लोगों ने घरों में मां काली के नाम पर आटा और गुड़ से निर्मित खेडा प्रशाद बनाया जिसे काली मां पर चढ़ाकर लोगों ने अपने घर में रखे हथियार, दराट, डांगरे, बॉस और अन्य हथियारों की धार तेज की। इसके बाद लोग अपने हथियार लेकर टोली बनाते हुए घर-घर गए और बकरे काटे।
इस दौरान लोगों ने खूब हो-हल्ला भी किया। कहा जाता है कि इन दिनों पहाड़ों में मां काली के रथ टूटते हैं जिसको रोकने के लिए यह पर्व हर घर में मनाया जाता है। यह पर्व गिरिपार क्षेत्र का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। इस दिन घर से बाहर गया परिजन अपने घर को लौटकर जरूर आता है। इस पर्व को सबसे खर्चीला भी माना जाता है। इसका कारण इस पर्व पर बकरा काटने की प्रथा है। इस दिन हर परिवार बकरा काटता है। बकरा काटने के लिए लोग ब्याज पर पैसा उठाते हैं। कई लोग तो पूरा वर्ष दिहाड़ी मजदूरी करके पैसा कमाते हैं और उससे बकरा खरीदते हैं।
कई लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती तो वह बकरा खरीदने के लिए अपनी जमीन, गहने तक बेच देते हैं। इसी कारण इस पर्व को सबसे खर्चीला पर्व कहा जाता है।
माघी पर्व जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के बाबर जौनसार में भी धूमधाम से आयोजित किया गया। इस पर्व को मनाने की प्रथा यहां सदियों से चली आ रही है। इससे पूर्व एक दिन पहले लोगों ने यह पर्व बोषता के रूप में मनाया। जबकि मकर संक्रांति के बाद माघी त्योहार में रिश्तेदारों के आने जाने का सिलसिला जारी रहता है। घर में कटे बकरे का सूखा मीट परोसा जाता है और रात में नाटियों का दौर चलता है। किसी कारण कोई रिश्तेदार मेहमान न आ सके तो उसके हिस्से का मीट अलग से रखा जाता है।
यह त्योहार गिरिपार का सबसे खर्चीला त्योहार है। बकरे के साथ-साथ चावल, मसाले, गुड़ ,आटा की खरीदारी करनी पड़ती है। घर की विवाहित लड़कियों को गुड़ की भेली और आटा, चावल ले जाने की परंपरा कायम है।
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