जिला अदालत ने 27 अप्रैल 2026 को दिए ट्रायल कोर्ट के निर्णय को रखा बरकरार, सरकार की अपील खारिज
तहसील पच्छाद में संयुक्त भूमि में सरकार को नहीं मिला अलग हिस्सा
कोर्ट ने कहा-बिना बंटवारे सह-भूस्वामी नहीं दे सकता जमीन का तय हिस्सा
दीपक मेहता
नाहन (सिरमौर)। जिला न्यायालय ने संयुक्त भूमि विवाद के एक अहम मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संयुक्त जमीन में कोई भी सह-भूस्वामी बिना विधिवत बंटवारे के किसी खास हिस्से को सरकार या किसी अन्य के नाम नहीं कर सकता। अदालत ने इसी आधार पर हिमाचल सरकार की अपील खारिज कर ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। जिला न्यायाधीश योगेश जसवाल ने फैसले में कहा कि वर्ष 1975 की म्यूटेशन संख्या-68 और उससे जुड़ी मुसावी में गंभीर त्रुटियां थीं, जिनके कारण राजस्व रिकॉर्ड में गड़बड़ी पैदा हुई।
मामला तहसील पच्छाद के गांव चरावग की करीब 130 बीघा संयुक्त भूमि से जुड़ा है। वादी जोगिंदर दत्त ने अदालत में दावा किया था कि जमीन का कभी सीमांकन के आधार पर बंटवारा नहीं हुआ। इसके बावजूद तत्कालीन सह-भूस्वामी स्वर्गीय माता राम की ओर से भूमि सीलिंग कानून के तहत सरकार को सरेंडर की गई भूमि को रिकॉर्ड में एक निश्चित हिस्से के रूप में दर्ज कर दिया गया। इसके बाद में भूमि बंटवारे में दिक्कतें आने लगीं। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश फील्ड कानूनगो ने भी अदालत में स्वीकार किया कि म्यूटेशन के साथ तैयार की गई मुसावी गलत बनी थी।
अदालत ने माना कि इसी गलती से राजस्व रिकॉर्ड में ओवरलैप हुआ और जमीन का बंटवारा संभव नहीं हो पाया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संयुक्त संपत्ति में हर सह-भूस्वामी का पूरे भूखंड पर अविभाजित अधिकार होता है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति जमीन के किसी तय हिस्से पर अकेले दावा नहीं कर सकता। फैसले में कहा गया कि यदि सरकार को जमीन मिली भी थी तो वह केवल संबंधित सह-भूस्वामी के हिस्से तक सीमित मानी जाएगी, न कि किसी विशेष खसरा नंबर पर पूर्ण स्वामित्व के रूप में। इसी आधार पर अदालत ने राज्य सरकार की अपील निराधार मानते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला कायम रखा। संवाद