वन मंडल पांवटा साहिब में साल के पेड़ों पर बोरर बीटल कीट ने हमला किया है। विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष मानसून की बारिश लंबे समय तक रहने के कारण कीट विकसित हुआ है। कीट के आक्रमण के बाद वन विभाग भी सतर्क हो गया है और इस पर नियंत्रण के लिए कार्रवाई शुरू कर दी गई है। वन विभाग के अनुसार हाल ही में साल प्रजाति के कुछ पेड़ों पर बोरर बीटल कीट देखा गया। इसकी सूचना मिलते ही सभी वन रेंजों से रोगग्रस्त पेड़ों की जांच कर रिपोर्ट मांगी गई है। प्रारंभिक जांच में कुकड़ों, मालगी और खारा के वन क्षेत्रों से मिली जानकारी के अनुसार करीब 100 पेड़ रोग से प्रभावित पाए गए हैं। विभाग का मानना है कि यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो यह रोग तेजी से फैल सकता है।
बोरर बीटल साल के पेड़ों पर हमला कर उनका रस चूसने लगता है। धीरे-धीरे कीट पेड़ के अंदर तक पहुंचकर जगह-जगह छेद कर देता है। इससे पेड़ खोखला होने लगता है और अंततः सूख जाता है। ऐसे पेड़ बाद में इमारती लकड़ी के रूप में भी उपयोग के योग्य नहीं रहते। क्षेत्र में साल के घने जंगल हैं। यहां की जलवायु साल प्रजाति के लिए अनुकूल मानी जाती है। इसके कारण यहां अच्छी गुणवत्ता की लकड़ी पाई जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक बरसात रहने से बोरर बीटल प्राकृतिक रूप से पनपता है और पेड़ की छाल में छिपकर उसे नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है। शुरुआत में इस रोग का पता लगाना मुश्किल होता है। जब यह पेड़ के अंदर तक पहुंचकर उसे खोखला करने लगता है, तब पेड़ से बुरादा झड़ने लगता है और उसी समय इसका पता चलता है।
विशेषज्ञों के अनुसार बोरर बीटल एक बार में करीब 300 अंडे देता है। यह अंडे पेड़ की छाल में सुरक्षित रखता है। जून के अंतिम सप्ताह में मानसून की पहली बारिश के साथ इन अंडों से कीट निकलकर दूसरे पेड़ों पर हमला करना शुरू कर देते हैं। इस तरह एक पेड़ से हजारों बीटल आसपास के पेड़ों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
पांवटा वन मंडल के अनुसार करीब 100 पेड़ों में इस रोग के लक्षण मिलने से स्थिति चिंताजनक मानी जा रही है। यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले समय में प्रभावित पेड़ों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है।
27 वर्ष पहले भी सामने आया था यह रोग
बताया जा रहा है कि पांवटा साहिब क्षेत्र में करीब 27 वर्ष पहले वर्ष 1998 में भी बोरर बीटल सामने आया था। उस समय यह रोग तेजी से फैल गया था, जिससे वन विभाग की मुश्किलें बढ़ गई थीं। विशेषज्ञों की टीमों ने लंबे समय तक प्रयास किए और करीब चार वर्ष बाद वर्ष 2002 में इस रोग पर काबू पाया जा सका था। उस दौरान भी बड़ी संख्या में पेड़ों को नुकसान पहुंचा था।
कुछ क्षेत्रों से साल के पेड़ों में बोरर बीटल की सूचना मिली है। इस वर्ष मानसून देर तक रहने के कारण इस कीट के पनपने की संभावना बढ़ी है। सभी वन रेंजों से इसकी रिपोर्ट मांगी गई है। रोग को रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जा रही है। -वेद प्रकाश, वन मंडल अधिकारी, पांवटा साहिब