अमर उजाला ब्यूरो
ददाहू (सिरमौर)। लोकसभा चुनाव और अगली सरकार से किसानों को क्या उम्मीदें हैं। इसको जानने के मकसद से ददाहू के एक रेस्तरां में अमर उजाला ने किसानों के साथ संवाद किया। इसमें इलाके की विभिन्न पंचायतों के किसानों ने भाग लिया। संवाद के माध्यम से किसानों ने फसलों के लिए सिंचाई, विपणन, फसल बीमा योजना की खामियां, फसलों पर लगने वाले रोगों से संबंधित कई समस्याएं बताईं। किसानों ने कृषि के लिए केंद्र सरकार के बजट को भी नाकाफी करार दिया है।
किसानों ने कहा कि अब तक सरकार चाहे किसी भी दल की बनी हो, किसानों की समस्याओं पर किसी ने गौर नहीं किया। कुल बजट का महज डेढ़ फीसदी कृषि पर खर्च होता है। जबकि, कुल बजट का कम से कम दस फीसदी कृषि के लिए होना चाहिए। किसान दिन-रात मेहनत करने के बाद फसल तैयार करता है, लेकिन विपणन की बेहतर सुविधा नहीं होने के कारण उसे औने-पौने दामों में बेचने को विवश है। सिंचाई की सुविधा नहीं होने से फसल खेतों में ही खराब हो रही है। जबकि पुरानी फसलों को बचाने के लिए कोई शोध नहीं किए जा रहे। कहा कि किसानों के लिए बंदर और जंगली जानवर सबसे बड़ी समस्या है। बंदरों के आतंक के कारण लोग खेती छोड़ रहे हैं। युवा खेतीबाड़ी छोड़कर नौकरी के लिए शहरों की ओर भाग रहे हैं। बड़े-बड़े भू-भाग बंजर हो रहे हैं।
फसल बीमा योजना में ढेर सारी खामियां
फसल बीमा योजना में ढेर सारी खामियां हैं। इसका मुआवजा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मिलता है। जबकि, हिमाचल की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह बीघा के हिसाब से होना चाहिए। एक बीघा में फसल नष्ट होने पर 200 से 300 रुपये देने का ही प्रावधान है। फसल बीमा योजना में फेंसिंग का तो प्रावधान है लेकिन, गेट को कोई प्रावधान नहीं है। किसान 25 फीसदी (लगभग 30 से 50 हजार रुपये) खर्च करने में भी असमर्थ है। लिहाजा, इस पर सौ फीसदी सब्सिडी होनी चाहिए। फसलों के दाम लागत मूल्य के अनुसार तय होने चाहिए। हर उत्पाद की कीमत जब उसकी लागत के साथ तय होती है कि कृषि उत्पादों की क्यों नहीं? कृषि विभाग में अधिकारियों और कर्मचारियों के पद रिक्त होने से दिक्कत हो रही है। किसान अपनी समस्या लेकर कहां जाएं।
क्या है सिरमौर की भौगोलिक स्थिति
सिरमौर मुख्य रूप से तीन धारों के नाम से जाना जाता है। इनमें सैनधार, धारटीधार और गिरिपार मुख्य रूप से शामिल हैं। पहाड़ी इलाका होने की वजह से खेती पहाड़ों पर की जाती है और नदी-नालों का पानी जमीन से होकर बहता है। लिहाज, तमाम फसलें बारिश पर निर्भर हैं। लगभग 70 फीसदी क्षेत्रों में फसलें बारिश पर ही निर्भर हैं। ऐसे में सूखा पड़ने अक्सर फसलें खराब हो जाती है।
सिरमौर जिले की आबादी करीब साढ़े पांच लाख है। नाहन और पांवटा को छोड़कर यहां बाकी अन्य सभी इलाके ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। जिले में 80 फीसदी से अधिक परिवारों की आय का मुख्य साधन कृषि है। मुख्य रूप से गेहूं और मक्की की खेती की जाती है। इसके अलावा अदरक, टमाटर, लहसुन, शिमला मिर्च, मूली, खीरा, गोभी जैसी नकदी फसलों का बड़े पैमाने पर किसान उत्पादन कर रहे हैं। फलों में यहां के ऊंचे इलाकों में सेब, नाशपाती, आडू और बादाम की फसल तैयार होती है।
1. ददाहू के किसान सीआर वर्मा ने बताया कि किसानों को अच्छे बीज नहीं मिल रहे हैं। उन्नत खेती के लिए अच्छे बीज, सिंचाई की सुविधा और बेहतरीन दवाइयां मिलनी चाहिए लेकिन, ऐसा नहीं हो पा रहा है। इस वजह से पैदावार में कमी हो रही है। इसका सीधा असर किसानों की आर्थिकी पर पड़ रहा है।
2. पराड़ा गांव के अर्जुन अत्री ने बताया कि किसान अपने खेत में दिन-रात मेहनत कर फसल तैयार करता है। लेकिन, सिंचाई, सड़क और विपणन की बेहतर सुविधा नहीं होने के कारण उन्हें अपनी फसल के उचित दाम नहीं मिल पाते। उस पर किसानों की मनरेगा के तहत महज 182 रुपये दिहाड़ी भी नाकाफी है। जबकि बंदरों से फसलों को बचाने के लिए सोलर फेंसिंग भी कामयाब नहीं हो रही।
3. मोहतु गांव के पूर्ण चंद का कहना है कि फसल बीमा योजना में कई खामियां हैं। किसान क्रेडिट कार्ड बनाने वालों पर जबरन यह फसल का बीमा थोपा जा रहा है। जबरन 600 रुपये प्रतिबीघा काटे जा रहे हैं। जबकि, फसल का नुकसान होने पर दो से तीन सौ रुपये ही मिलते हैं। उस पर फसल बीमा की औपचारिकताएं बहुत जटिल हैं। छह हजार रुपये देने की योजना का बांध विस्थापितों को कोई लाभ नहीं मिल रहा।
4. महिपुर के सतपाल मान के अनुसार हिमाचल में महज नौ फीसदी जमीन पर खेती होती है। उसमें से 19 प्रतिशत पर ही सिंचाई की सुविधा है। यानी अधिकतर जमीन की सिंचाई बारिश पर निर्भर है। क्रय केंद्र नहीं होने के कारण किसान बिचौलियों के हाथों में लुट रहे हैं। कृषि विभाग में कई पद खाली चल रहे हैं। इससे पुराने बीजों पर कोई अध्ययन नहीं हो रहा। मनरेगा की दिहाड़ी कम से कम 500 रुपये की जानी चाहिए।
5. पनार पंचायत के हरिंद्र का कहना ह कि किसानों के लिए केंद्र सरकार मजबूत योजनाएं बनाए। दवाई, बीज और उपकरणों की सुविधा पंचायत स्तर पर उपलब्ध होनी चाहिए। जिले में फसलों के भंडारण के लिए कोल्ड स्टोर जैसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। छह महीने लगातार काम करने के बाद जब फसल होती है तो किसान बिचौलियों के हाथों लुट जाते हैं।
6. चानणी के बिशन ने बताया कि बंदरों की वजह से किसान खेती छोड़ने को विवश हैं। 50 से फीसदी किसान अब खेती छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर नौकरी तलाश कर रहे हैं। 90 फीसदी से ज्यादा लोगों ने खेती छोड़ दी है।
7. कोटि धीमान के कल्याण सिंह तोमर ने बताया कि जिले में अब किसान खेती करने से मुंह मोड़ने लगे हैं। इसका मुख्य कारण सुविधाओं का अभाव है। सिंचाई की सुविधा नहीं होने के कारण फसलों को नुकसान पहुंच रहा है। नदियां नीचे हैं तो खेती ऊंचे पहाड़ों पर हो रही है। लिहाजा, उठाऊ सिंचाई योजना का बनना बेहद जरूरी है।
8. डंडोर के रवि दत्त कपिल का कहना है कि कभी अदरक यहां की मुख्य फसल थी लेकिन, पिछले कुछ सालों से अदरक सड़न रोग की चपेट में आ गई है। अब यहां के किसान अदरक की खेती नहीं कर रहे। लाखों रुपये का वेतन लेने वाले कृषि वैज्ञानिक भी सड़न रोग की रोकथाम के लिए कोई उपाय नहीं खोज पा रहे। परिणाम स्वरूप जिले से अदरक की फसल लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है।
9. नेहर स्वार के लव राज ने बताया कि जिले में फसलों के विपणन की सुविधा नहीं होने के कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। बेहतर सब्जी मंडियों का तक जिले में प्रावधान नहीं है। किसान अपने स्तर पर अपनी फसल बाजार तक पहुंचा रहे हैं।
10. बानाकोटी के नीशू का कहना है कि कुछ क्षेत्र को बंदरों को मारने की छूट दी गई है। इसके लिए इलाके को वर्मिन घोषित किया गया है। लेकिन, यह नाकाफी है। बंदरों को मारने के लिए लोगों के पास हथियार भी नहीं है। यदि बंदूक का लाइसेंस बनाएं तो इसके लिए भी 1700 रुपये लिए जा रहे हैं। हर तरफ से किसानों पर मार पड़ रही है।