नाहन (सिरमौर)।
ग्रामीण क्षेत्र में बंदरों के उत्पात ने किसानों की नींद उड़ा दी है। बंदरों पर काबू पाने के सरकार के तमाम दावों के बावजूद बंदरों की फौज लगातार बढ़ रही है। आलम यह है कि दिन में बंदर तो रात को जंगली सूअर किसानों की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं। सब्जी उत्पादन, बागवानी व खेतीबाड़ी पूरी तरह चौपट हो गई है।
किसानों को उनकी लागत भी नसीब नहीं हो रही है जिस कारण किसान-बागवान आंसू के घूंट पीने को विवश हैं। अब तो बंदरों ने लोगों पर भी हमले करने शुरू कर दिए हैं। घरों में घुसकर सामान को तहस नहस कर रहे हैं। बंदरों व जंगली जानवरों पर काबू न पाए जाने के कारण क्षेत्र के भूड़, शंभुवाला, विक्रमबाग, नेरला, कून, मोगीनंद, सैनवाला आदि दर्जनों गांवों में अधिकतर किसानों ने खेती-बाड़ी छोड़ दी है।
स्थानीय निवासी रमेश भंडारी ने कहा कि बंदर खेतों में घुसकर फसल तहस-नहस कर रहे हैं। उनको लागत भी नहीं पड़ रही। मेहनत भी व्यर्थ साबित हो रही है। सरकार को बंदरों से नष्ट हुई फसल पर मुआवजे का प्रावधान करना चाहिए।
जबकि कमलेश कुमार ने कहा कि बंदर फसलों के साथ-साथ पशुओं को चारे के रूप में खिलाए जाने वाली बरसीन को खा रहे हैं। बच्चों व महिलाओं पर हमले कर रहे हैं। इससे छुटकारा दिलाया जाना चाहिए।
जय किशोर ने कहा कि दिन में बंदर, रात को जंगली जानवर फसल तबाह कर रहे हैं। सब काम छोड़ खेतों की रखवाली भी करनी पड़ रही है। अंत में दिहाड़ी भी नसीब नहीं हो रही।
कश्मीरी लाल ने कहा कि बंदरों के खौफ से गोगटी जैसी फसलों को उगाना शुरू किया था जिन्हें बंदर नहीं खाते लेकिन बंदर उन्हें भी उजाड़ रहे हैं। रात को जंगली जानवर फसल तबाह कर रहे हैं।
रामेश्वर शर्मा ने कहा कि खेतों व बगीचों ने उन्हें कुछ नहीं मिल रहा। सब बंदर-जानवर तबाह कर हे हैं। सरकार को बंदर सदन खोलने पर विचार करना चाहिए। बंदरों के फसल बर्बाद करने पर मुआवजा देना चाहिए।
उधर रणदीप ने कहा कि बंदर हिंसक हो चुके हैं। महिलाओं-बच्चों पर हमला कर रहे हैं। लोगों की रोजी-रोटी छीन रहे हैं। सरकार गौसदन की तर्ज पर बंदर सदन खोले, तभी उन्हें छुटकारा मिलेगा। खेती बच पाएगी।