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तिब्बती समुदाय ने संघर्ष दिवस की वर्षगांठ मनाई

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अमर उजाला ब्यूरो
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पांवटा साहिब/नाहन (सिरमौर)। तिब्बती समुदाय ने संघर्ष दिवस की 60वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम का आयोजन किया। सोमवार को नाहन पहुंचकर सैकड़ों तिब्बती समुदाय के लोगों ने रैली निकालकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया, जबकि पांवटा में भी तिब्बती समुदाय ने वर्षगांठ मनाई। रविवार को वर्ष 1959 के संघर्ष दिवस से अब तक जान न्योछावर करने वाले पुरुषों और महिलाओं को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पूर्व लहासा तथा तिब्बत में चीन और चीन की सेना पब्लिक लिबरेशन आर्मी की ओर से दमन की शुरुआत की गई और और लाखों तिब्बती शूरवीरों ने इस दमन और हिंसा के विरोध में अपनी शहादत दी। कार्यक्रम में तिब्बती महिला संगठन समेत वक्ताओं ने कहा कि विश्व के इतिहास में यह दिन काले दिवस के रूप में दर्ज हुआ। आज उन शूरवीर स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने का दिन है। कार्यक्रम में व्यापार मंडल पांवटा के अध्यक्ष अनिंद्र सिंह ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। उन्होंने तिब्बत के स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए 60 वर्षों से जारी तिब्बत के स्वतंत्रता संग्राम, परम पावन दलाई लामा के दर्शन, अहिंसा के सिद्धांत और और शिक्षाओं पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में पांवटा भूपपुर तिब्बत संगठन के चेयरमैन कूंचोक
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सिंरिंग, स्थानीय सेटेलमेंट ऑफिसर गलेक कुंसेल जम्यांग ने इस दिवस के बारे में जानकारी दी। इस दौरान कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि व्यवसायी रविंद्र पाल खुराना और संदीप बत्रा मौजद रहे। उधर, नाहन में तिब्बती समुदाय के लोगों ने उपायुक्त कार्यालय तक रैली निकाली। नाहन में पत्रकार वार्ता में भूपपूर कमखतो बिब्ब्तन सेटलमेंट ऑफिसर कुचोंग, पुरुवाला के लोपसंग टेंपा, पांवटा के तेंजिन थापा, सतौन के तेंजिन सोनम ने कहा कि धर्मगुरु दलाईलामा के मार्गदर्शन में वह चीन के अधिकार में भी रहने को तैयार है बशर्ते बुद्ध धर्म, भाषा, संस्कृति जीवित रहे। उनका कहना है कि यदि उनकी संस्कृति से किसी को फायदा नहीं हुआ तो नुकसान भी नहीं होगा। आज भी करीब सबा लाख तिब्बती शरणार्थी भारत में रह रहे हैं। चीन ने 1959 में तिब्बत देश को हड़प लिया था। प्रधानमंत्री को भेजे ज्ञापन में तिब्बती समुदाय ने 60 वर्षों से देश में शरण देने के लिए देश के प्रत्येक नागरिक का आभार भी प्रकट किया है।
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