बिना कारण किसी का आवेदन खारिज करना अन्याय: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक निर्णयों में भी कारणों का उल्लेख होना अनिवार्य है। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने सरकार की ओर से एक संस्थान को मल्टीपर्पज हेल्थ वर्कर (पुरुष) एमपीएचडब्ल्यू (एम) ट्रेनिंग कोर्स शुरू करने के लिए आशय पत्र (एलओआई) और अनापत्ति प्रमाण पत्र न देने के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने प्रतिवादी प्रिंसिपल सेक्रेट्री हेल्थ और संबंधित अथॉरिटी को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता के मामले पर तीन सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार और मेरिट के आधार पर नए सिरे से विचार किया जाए। इस विचार प्रक्रिया में पहले से स्वीकृत 9 संस्थानों को दी गई मंजूरियों को भी ध्यान में रखा जाए।प्राधिकारी की ओर से जो भी आदेश पारित किया जाएगा, उसकी प्रति अनिवार्य रूप से याचिकाकर्ता संस्थान को भेजी जाए। सरकार ने 31 अगस्त 2023 को निजी क्षेत्र में एमपीएचडब्ल्यू (एम) ट्रेनिंग कोर्स शुरू करने के लिए एक नीति अधिसूचित की थी। इसके तहत याचिकाकर्ता शिवा एजुकेशनल सोसाइटी ने बिलासपुर जिले के चांदपुर में संस्थान खोलने के लिए आवेदन किया।
निरीक्षण और मूल्यांकन समिति ने संस्थान को पूरी तरह उपयुक्त पाया
निरीक्षण और मूल्यांकन समिति ने संस्थान को पूरी तरह उपयुक्त पाया और आशय पत्र (एलओआई) जारी करने की सिफारिश भी की। डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन की सूची में इस संस्थान का नाम 21वें स्थान पर था। जांच में कुल 27 संस्थानों को उपयुक्त पाया गया था, लेकिन सरकार ने बिना किसी स्पष्ट मापदंड और लिखित कारणों के केवल 9 संस्थानों (शुरुआत में 4 और बाद में कैबिनेट से मंजूरी पाकर 5) को मंजूरी दे दी। जब याचिकाकर्ता संस्थान के मामले को कैबिनेट के समक्ष रखा गया, तो उसे बिना कोई कारण बताए सीधे मंजूर नहीं लिखकर खारिज कर दिया गया। संस्थान ने सरकार के इस रवैये को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि स्थापित कानूनी सिद्धांतों और प्रक्रियाओं की अनदेखी कर शक्तियों का इस तरह मनमाने और सनकी ढंग से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि मनमानापन हमेशा समानता का विरोधी होता है। जब सरकार ने 9 संस्थानों को मंजूरी दी, इनमें से दो संस्थान (सूची में 11 और 12 नंबर वाले) नीति की शर्तों को पूरी तरह पूरा भी नहीं कर रहे थे, तो पूरी तरह योग्य पाए गए याचिकाकर्ता संस्थान को बिना कारण बताए बाहर करना सीधे तौर पर भेदभाव है। ऐसा मनमाना रवैया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
आर्बिट्रेटर का फैसला रद्द, हाईकोर्ट ने माना पब्लिक पॉलिसी के खिलाफ
प्रदेश हाईकोर्ट ने लोक निर्माण विभाग के सरकाघाट डिवीजन से जुड़े एक मामले में मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) की ओर से दिए गए अवार्ड को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई प्राधिकारी खुद मध्यस्थ बनने के लिए कानूनन अयोग्य है, तो वह किसी अन्य व्यक्ति को भी मध्यस्थ नियुक्त नहीं कर सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि ऐसा किया जाना देश की सार्वजनिक नीति और सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने दोनों याचिकाओं का निपटारा करते हुए 24 सितंबर 2022 के मध्यस्थता निर्णय को पूरी तरह से निरस्त कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को छूट दी है कि वे कानून के दायरे में आकर नए सिरे से अपनी शिकायतों के निवारण के लिए कानूनी रास्ता अपना सकते हैं।
यह विवाद ठेकेदार बलबीर सिंह और हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग (सरकाघाट डिवीजन) के बीच एक सड़क निर्माण कार्य के अनुबंध को लेकर था। समझौते की धारा-25 के तहत विभाग के मंडी जोन के तत्कालीन मुख्य अभियंता ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए विभाग के ही एक सेवानिवृत्त इंजीनियर-इन-चीफ अशोक कुमार चौहान को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त कर दिया था। इस मध्यस्थ ने 24 सितंबर 2022 को अपना फैसला सुनाया था, जिसे अदालत में चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि जब कोई प्राधिकारी या अधिकारी खुद विवाद के परिणाम में रुचि रखता है (जैसे कि वह उसी विभाग का कर्मचारी है, जिसका विवाद है), तो वह मध्यस्थ बनने के लिए अयोग्य हो जाता है। कानून में यह अकल्पनीय है कि जो व्यक्ति वैधानिक रूप से खुद अयोग्य है, वह किसी दूसरे व्यक्ति को मध्यस्थ नामित कर दे।