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Rampur Bushahar News: चूली की लकड़ी में विलुप्त हो रही शहनाई के सुर संजो रहे सनम

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कल्पा के सनम दोरजे 35 साल से बना रहे पारंपरिक वाद्ययंत्र, युवा पीढ़ी से परंपरा संजोए रखने की अपील
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एक सप्ताह की मेहनत के बाद तैयार होती है चूली की लकड़ी से बनी शहनाई

देवकला नेगी

रिकांगपिओ (किन्नौर)। आधुनिकता के शोर में पारंपरिक स्वर लहरियां विलुप्ति की कगार पर हैं। इन स्वर लहरियों को संजोने वाले वाद्ययंत्रों के कारीगर भी अब गिने चुने ही बचें हैं। जनजातीय जिला किन्नौर की संस्कृति और रीति-रिवाजों से जुड़ा ऐसा ही एक वाद्ययंत्र शहनाई है। जहां आज शहनाई वाद्ययंत्र को बजाने वाले कम ही कलाकार रह गए हैं, वहीं इस वाद्ययंत्र को बनाने की कला भी धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। हालांकि, सरकार और प्रशासन इसके संरक्षण के प्रति लगातार प्रयासरत हैं। डिजिटल युग में जहां इलेक्ट्रानिक तंत्रों से कई प्रकार की धुनें निकालनी संभव हो चुकी हैं, वहीं इस दौर में भी किन्नौर जिले के कल्पा के सनम दोरजे जितस चूली के पेड़ की लकड़ी से शहनाई जैसा वाद्ययंत्र बना रहे हैं। वह 35 साल से यह कार्य कर रहे हैं। साथ ही वह युवा पीढ़ी को संदेश दे रहे हैं कि शहनाई बजाने की कला अपने में अद्भुत है और कई पारंपरिक कलाएं व रीति-रिवाज इससे जुड़े हैं, इसलिए इसके संरक्षण के लिए आगे आएं। शहनाई वादन के लिए प्रशासन की ओर से प्रतियोगिताएं करवाई जा रही हैं, ताकि समय के साथ इस संस्कृति को जीवंत रखा जा सके।
कठिन है शहनाई बनाने का काम
शहनाई वादन की तरह ही शहनाई बनाने की कला भी अपने के एक अद्भुत और कठिन कारीगरी है। कल्पा के सनम दोरजे जितस 35 साल इस इस कारीगरी को जीवित रखे हुए हैं। दोरजे ने कहा कि शहनाई बनाने के लिए चूली के पेड़ की लकड़ी की आवश्यकता होती है। इसे काट कर मशीन की मदद से शहनाई का आकार दिया जाता है। कड़ी मेहनत के बाद शहनाई बनाकर तैयार की जाती है। लोग शहनाई बना तो लेते हैं, परंतु अलग-अलग हिस्सों में जोड़कर, इससे शहनाई के सुर में फर्क होता है। वह एक ही लकड़ी से शहनाई बनाते हैं और इसमें सुर भी एक बार में ही सही आ जाता है। शहनाई अगर गीली लकड़ी से बनाकर तैयार की जाए, तो उसे तेल में डालकर रखा जाता है, ताकि लकड़ी सूखने के बाद शहनाई फट न जाए। एक शहनाई को बनाने में करीब एक सप्ताह का समय लग जाता है।
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शहनाई वादक भी हैं दोरजे
कारीगर सनम दोरजे ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी शहनाई को भूलती जा रही है और शहनाई वादन को छोड़ अन्य नए वाद्ययंत्रों का प्रचलन बढ़ रहा है। वह शहनाई बजाते भी हैं और शहनाई बजाना उन्होंने अपने पिता से सीखा है। उनके पिता स्व. ख्याली राम जितस भी शहनाई बजाते थे और ऑल इंडिया रेडियो में किन्नौरी कार्यक्रम शुरू होने से पहले उनके पिता की ओर से बजाई गई धुन आज भी सुनने को मिलती है। -संवाद
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