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Rampur Bushahar News: नालों में उगने वाले लिंगड़ को बेचकर आजीविका कमा रहे कई परिवार

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नेरवा (रोहड़ू) पर्वतीय क्षेत्रों में कुदरती तौर पर उगने वाली गुच्छी के बाद अब स्थानीय लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन लिंगड़ की सब्जी भी बन चुका है। मई से जुलाई तक चार हजार से नौ हजार फीट की ऊंचाई पर नदी और नालों के किनारे नमी वाले स्थानों पर उगने वाले लिंगड़ की गांव से लेकर शहरों तक भारी मांग है। स्थानीय लोग इसकी गुच्छियां बना कर बेचने से अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं। बाजार में लिंगड़ की करीब पांच सौ ग्राम की एक गुच्छी की कीमत तीस रुपये से पचास रुपये तक है। हिमाचल प्रदेश के अलावा उत्तराखंड,जम्मू-काश्मीर, दार्जलिंग, सिक्किम और असम में यह पाया जाता है।
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अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नाम से जाना जाता है। हिमाचल में इसे लिंगड़, लिंगड़ी, लुंगडु, कसरोद, लांगुड़ा, कुमाऊं क्षेत्र में लिंब्रा,जम्मू काश्मीर में कसरोद, कंडोर, टेड व धीड़, त्रिपुरा में माईखुन्चोक, दार्जलिंग और सिक्किम में न्यूरो तथा असम में ढेकिया के नाम से जाना जाता है। इसका अंग्रेजी नाम फिडल हेड और वैज्ञानिक नाम डिपलीजियम एस्कुलेंटम है। आजकल के मौसम में प्रदेश के गांव से लेकर शहरों तक इसकी भारी मांग है। स्थानीय लोग जंगलों में नदी नालों के किनारे से इसे एकत्रित कर इसकी आपूर्ति बाजारों में कर रहे हैं। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर बेच कर भी लोग इससे आजीविका कमा रहे हैं। लिंगड़ की स्वादिष्ट सब्जी के अलावा इसका लजीज और चटपटा आचार बनाया जाता है।

कई जगह इसका स्वादिष्ट मधरा बनाया जाता है। विशेषज्ञों की माने तो लिंगड़ में मेग्नेशियम, कैल्शियम,फॉस्फोरस,पोटाशियम,आयरन,ज़िंक,विटामिन ए और बी कांप्लेक्स और कैरोटीन पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। गर्मियों के तीन महीने तक पहाड़ों में कुदरती तौर पर उगने वाली इस सब्जी को मधुमेह, हृदय और लिवर की बिमारियों, कुपोषण से बचाव,चर्मरोग तथा इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में लाभदायक माना जाता है । बहरहाल पहाड़ी क्षेत्रों में जहां लिंगड़ की सब्ज़ी,आचार और मधरा जैसे व्यंजनों के चटखारे लिए जा रहे है,वहीं यह स्थानीय लोगों की आजीविका का साधन भी बना हुआ।
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