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Rampur Bushahar News: लवी मेले में छाए किन्नौरी ड्राई फ्रूट्स, चिलगोजा 1800 रुपये किलो

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राजमाह का 450 रुपये तो गुच्छी के 14 हजार किलोग्राम दाम
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अंतरराष्ट्रीय लवी मेले का आकर्षण बनी किन्नौरी मार्केट

संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर। अंतरराष्ट्रीय लवी मेला मंगलवार से शुरू हो गया। अब एक माह तक इस मेले में व्यापारिक गतिविधियां जारी रहेंगी। मेले में किन्नौरी मार्केट अगल से लगाई गई है। इस मार्केट में किन्नौर के दूरदराज से आए कारोबारियों ने स्टॉल लगाए हैं। इन स्टॉलों पर किन्नौरी ड्राई फ्रूट और राजमाह छाए हुए हैं।
पहले दिन से मेले में लोग बड़ी संख्या में किन्नौरी मार्केट में ड्राई फ्रूट की खरीदारी करने के लिए पहुंच रहे हैं, लेकिन कीमतें काफी ज्यादा हैं। चिलगोजा इस बार 1800 प्रति किलो बिक रहा है। लद्दाख की खुमानी 450 से 500 रुपये, लोकल अंजीर 2,000 रुपये, बादाम 450 से 600 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रहे हैं। सफेद राजमाह 420 रुपये, लाल राजमाह 450 रुपये, काला जीरा 3000 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रहे हैं। बाजार में गुच्छी भी 14 हजार रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रही है। किन्नौर के नाको से आए एक कारोबारी ने बताया कि इस बार चिलगोजा 1800 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है। इस बार इसकी पैदावार कम हुई है और मेले में मांग ज्यादा रहती है, जिस कारण इसकी कीमत इस बार इतनी ज्यादा है। इसके अलावा किन्नौरी मार्केट में गोल्डन सेब की पेटी 1400 रुपये और गोल्डन सेब की पेटी 1600 रुपये में बिक रही है। इसके अलावा कारोबारी विभिन्न की दालें और मसाले में बेचने के लिए लाए हैं। किन्नौरी टोपी और शॉल के भी स्टॉल मार्केट में लगे हैं। बाकी मेला मैदान पर अभी दुकानें लगनी जारी हैं।
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इनसेट
मेले का 300 साल पुराना इतिहास
अंतरराष्ट्रीय लवी मेला 300 साल का इतिहास समेटे हुए है। बुशहर रियासत में लवी मेला मध्य शताब्दी से चल रहा है। लवी की स्थापना सतलुज घाटी और पश्चिमी तिब्बत के बीच एक व्यापार मेले के रूप में की गई थी, जिसके लिए बुशहर राजघराने और तिब्बत के 5वें दलाई लामा के बीच 1681 में एक संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। उस समय बुशहर के राजा केहर सिंह और दलाई लामा के बीच मित्रता के प्रतीक के रूप में घोड़ों और तलवारों का आदान-प्रदान हुआ था। यह प्रतिज्ञा की गई कि जब तक सतलुज सूख नहीं जाती या कौवे सफेद नहीं हो जाते, तब तक प्रत्येक शरद ऋतु में व्यापार मेला आयोजित किया जाएगा। मेले में कभी तिब्बत, अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान के व्यापारी कारोबार करने के लिए आते थे। वे विशेष रूप से ड्राई फ्रूट, ऊन, पशम और भेड़-बकरियों सहित घोड़ों को लेकर यहां आते थे। इसके अलावा ऊन से बने उत्पादों की खरीद-फरोख्त भी होती थी।
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