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Rampur Bushahar News: मौसम की बेरुखी से घटी पैदावार, मंडियों में मंदा सेब कारोबार

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पराला मंडी मे बहुत कम नजर आ रहे वहान। संवाद
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अभियान : पराला मंडी में सेब की आवक आधी होकर प्रतिदिन 150 पिकअप वाहन रह गई
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कम फसल का असर, बागवानी पर निर्भर पूरे आर्थिक तंत्र को किया प्रभावित
. मजदूरों को कम काम मिल रहा, खरीदारों और आढ़तियों का कारोबार घटा
ट्रांसपोर्टर, छोटे वाहन संचालक, पैकिंग सामग्री विक्रेता, स्थानीय दुकानदार भी कम कारोबार से जूझ रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
कोटखाई (रोहड़ू)। इस वर्ष सेब की कम पैदावार का असर प्रमुख फल मंडियों पर साफ दिखाई दे रहा है। मौसम की बेरुखी से घटी पैदावार के कारण मंडियों में सेब कारोबार मंदा पड़ा हुआ है। अगस्त में जहां हर साल पराला मंडी समेत अन्य मंडियों के बाहर सेब से लदे वाहनों की लंबी कतारें लगती थीं, वहीं इस बार सड़कें लगभग खाली हैं। मंडियों में पहले जैसी भीड़ और कारोबार की रफ्तार नहीं है। इससे बागवानी पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर चिंता बढ़ गई है। पराला मंडी में सेब की आवक लगभग आधी होकर प्रतिदिन 150 पिकअप वाहन रह गई है। इस बार सेब से लदे वाहन सीधे ऑक्शन यार्ड तक पहुंच रहे हैं। पिछले वर्षों में उन्हें अपनी बारी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था। मंडी के बाहर लंबी कतारें लगी रहती थीं। बागवान राजेश मेहता, नीरज ठाकुर, लोकेंद्र चौहान, सुरेंद्र सावंत और बलदेव ने इस स्थिति को बिल्कुल विपरीत बताया। उनका कहना है कि कम फसल का असर केवल बागवानों तक सीमित नहीं है। इससे बागवानी पर निर्भर पूरा आर्थिक तंत्र प्रभावित हो रहा है। मजदूरों को कम काम मिल रहा है। खरीदारों और आढ़तियों का कारोबार भी घटा है। ट्रांसपोर्टर, छोटे वाहन संचालक, पैकिंग सामग्री विक्रेता और स्थानीय दुकानदार भी कम कारोबार से जूझ रहे हैं। बागवानों के अनुसार, सामान्य वर्षों में जिन बगीचों से करीब एक हजार पेटियां सेब निकलती थीं, वहां इस बार उत्पादन घटकर मात्र 100 पेटियों तक सिमट गया है। उन्होंने अपने जीवन में पहली बार इतनी कम सेब की फसल देखी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि यह स्थिति बनी रही, तो हजारों परिवारों की आय प्रभावित होगी। इससे स्थानीय बाजारों की गतिविधियां भी धीमी पड़ सकती हैं।


महिलाओं की चिंता और खर्चों का बोझ
ठियोग क्षेत्र की महिलाएं भी इस बार स्वयं पराला मंडी में सेब बेचने पहुंच रही हैं। कुठार-बनेहार गांव की बिमला शर्मा और संतोषी चौहान ने बताया कि इस वर्ष फसल बेहद कम हुई है। बगीचों से जितनी थोड़ी-बहुत पेटियां निकली हैं, उन्हें लेकर वे स्वयं मंडी पहुंची हैं। उन्होंने कहा कि मंडी में सेब के दाम संतोषजनक मिल रहे हैं लेकिन उत्पादन कम होने के कारण पूरे वर्ष के खर्चों को लेकर चिंता बढ़ गई है। मजदूरी, दवाइयों, खाद और परिवार के अन्य खर्चों का प्रबंधन करना इस बार कठिन हो गया है। यह स्थिति बागवानी से जुड़े परिवारों के लिए आर्थिक चुनौती बन गई है। उन्हें अपने दैनिक खर्चों को पूरा करने में भी परेशानी हो रही है।
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ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट
सेब की कम पैदावार का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। बागवानी पर निर्भर हजारों परिवारों की आय बुरी तरह प्रभावित हुई है। स्थानीय बाजारों की गतिविधियां भी धीमी पड़ गई हैं। मजदूरों से लेकर ट्रांसपोर्टरों तक सभी के कारोबार में गिरावट आई है। यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव देखने को मिल सकता है। सरकार और संबंधित विभागों को इस समस्या पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
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इस बार सेब की कम पैदावार हुई है। मंडी की आवक पर इसका स्पष्ट प्रभाव दिख रहा है। पिछले वर्ष इसी अवधि में प्रतिदिन लगभग 300 पिकअप वाहन सेब लेकर मंडी पहुंचते थे। इस बार यह संख्या घटकर करीब 150 वाहन प्रतिदिन रह गई है। आवक लगभग आधी होने के कारण मंडी परिसर में पहले जैसी भीड़ और वाहनों की लंबी कतारें देखने को नहीं मिल रही हैं। इससे स्पष्ट है कि कम उत्पादन का असर खेतों से लेकर मंडियों और पूरे बागवानी कारोबार पर पड़ रहा है। यह स्थिति पूरे क्षेत्र के लिए चिंता का विषय है।
- सचिन शर्मा, इंचार्ज, एपीएमसी पराला मंडी



पराला मंडी मे बहुत कम नजर आ रहे वहान। संवाद

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