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Rampur Bushahar News: कुल्लू दशहरा में शामिल होने के लिए निकले आनी-निरमंड के देवी-देवता

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100 से 150 किलोमीटर लंबी पैदल सफर तय कर ढालपुर पहुंचेंगे
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भगवान रघुनाथ के दरबार में भरेंगे हाजिरी
संवाद न्यूज एजेंसी
आनी (कुल्लू)। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में शामिल होने के लिए आनी और निरमंड क्षेत्र के देवी-देवताओं की देव यात्राएं शुरू हो गई हैं। देव वाद्ययंत्रों की गूंज और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच देवता अपने हारियानों और देवलुओं के साथ 100 से 150 किलोमीटर तक लंबी पैदल सफर तय कर कुल्लू के ऐतिहासिक ढालपुर मैदान पहुंचेंगे। यहां भगवान रघुनाथ के दरबार में हाजिरी भरकर देवी-देवता सदियों पुरानी देव परंपरा का निर्वहन करेंगे। आनी क्षेत्र से शमशरी महादेव, खड्डी जल देवता, कुंइरी व्यास ऋषि, कोटभझारी, कुईकंडा नाग, जगेश्वर महादेव, टकरासी नाग, चोतरु नाग और बिश्लु नाग सहित कई देवी-देवता दशहरा उत्सव के लिए रवाना हो चुके हैं। निरमंड क्षेत्र से दुराह देवी, चंभू देवता, कशोली के चंभू देवता, बाड़ी डमोहरी और बूढ़ा सराहनी सहित अन्य देवी-देवता भी अपनी पारंपरिक देव यात्राओं पर निकल पड़े हैं। आनी और निरमंड के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों से निकलने वाली इन देव यात्राओं का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। देवता अपने हारियानों और देवलुओं के साथ कठिन पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए ढालपुर पहुंचते हैं। यात्रा के दौरान देव वाद्ययंत्रों की गूंज, पारंपरिक नृत्य और धार्मिक रीति-रिवाज देव संस्कृति की अनूठी छटा बिखेरते हैं। स्थानीय लोगों के लिए ये यात्राएं आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का भी अवसर होती हैं।
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राजा जगत सिंह से जुड़ा है दशहरा का इतिहास
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव की ऐतिहासिक परंपरा राजा जगत सिंह के शासनकाल से जुड़ी मानी जाती है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, 17वीं शताब्दी में एक ब्राह्मण के पास बहुमूल्य मोती होने की सूचना मिलने पर राजा ने उससे मोती सौंपने को कहा। इस घटना से आहत ब्राह्मण ने अपने परिवार सहित आत्मदाह कर लिया। इसके बाद राजा को गहरा पश्चाताप हुआ और वह मानसिक पीड़ा से घिर गए। लोकमान्यता के अनुसार, एक बाबा की सलाह पर राजा अयोध्या से भगवान रघुनाथ की मूर्ति कुल्लू लाए। भगवान रघुनाथ को प्रतिष्ठित करने के बाद राजा ने क्षेत्र के देवी-देवताओं को आमंत्रित कर उत्सव आयोजित किया। तभी से कुल्लू में दशहरा उत्सव के दौरान विभिन्न क्षेत्रों के देवी-देवताओं के एकत्रित होने की परंपरा चली आ रही है। आज अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा देश-विदेश में हिमाचल की विशिष्ट पहचान बन चुका है। आनी और निरमंड के देवी-देवताओं की लंबी पैदल यात्राएं न केवल लोगों की अटूट आस्था को दर्शाती हैं, बल्कि प्रदेश की समृद्ध देव संस्कृति, सांस्कृतिक एकता और सदियों पुरानी परंपराओं को भी जीवंत बनाए रखती हैं।
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