रिकांगपिओ (किन्नौर)। किन्नौर जिले में हुई बर्फबारी और बारिश सेब की फसल के लिए बेहद लाभदायक है। इस बर्फबारी और बारिश के बाद सेब के बगीचों में चिलिंग ऑवर की शुरुआत हुई है। सेब के पौधों को करीब 1000 से 1600 घंटे 7 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान चाहिए होता है, जो की सही समय पर बर्फबारी होने से पूरी होने की आशा है। अगर तापमान पौधे की बढ़ोतरी के समय 21 से 24 डिग्री के बीच रहेगा तो आने वाले साल किन्नौर में सेब की अच्छी पैदावार होगी।
डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्योनिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के शार्बो क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र के विशेषज्ञ डॉ. अरुण कुमार नेगी ने बताया कि सर्दियां शुरू होते ही बागवानों के लिए सेब की काट-छांट का कार्य शुरू हो जाता है। यह सेब की अच्छी पैदावार के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब के पेड़ अधिक ठंड के कारण जम जाते हैं।
ऐसे में कटाई और छंटाई के कार्य करने से पेड़ों की टहनियां के टूटने, सूखने और कैंकर जैसी बीमारी लगने का खतरा बना रहता है। इसको देखते हुए ऊंचाई और अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों के बागवानों को बगीचों में सेब के पौधों की प्रूनिंग फरवरी के अंत से लेकर रस चढ़ने से 10 दिन पहले तक करनी चाहिए। निचले क्षेत्रों में जहां ठंड अधिक ऊंचे क्षेत्रों की अपेक्षा कम रहती हैं, वहां प्रूनिंग का कार्य दिसंबर माह के बाद शुरू किया जा सकता है। निचले क्षेत्रों में ठंड का प्रकोप कम रहता है।
इस कारण काट-छांट के जख्म में कैंकर और अन्य बीमारियां कम लगती है। इन क्षेत्रों में भी यह कार्य पौधे में रस चढ़ने के 10 दिन पहले ही पूरा करना चाहिए। जिले के सभी बागवान अपने-अपने बगीचों में तौलिए बनाने और खाद डालने का कार्य भी अब आरंभ कर सकते हैं। दिसंबर और जनवरी के महीने में गोबर की खाद के साथ-साथ पोटाश, फास्फोरस की पूरी मात्रा का प्रयोग करें।
बागवानों को जहां तक संभव हो सके गोबर की खाद का ही उपयोग करना चाहिए। अभी तक 300 से अधिक बागवानों को सेब के पौधे से संबंधित जानकारियां ले चुके है। यहा तक हिमाचल के दूरदराज क्षेत्रों से बागवान व्हाट्सएप के माध्यम से भी जानकारियां लेते हैं। उन्होंने कहा की सेब की पैदावार किन्नौर में अभी काफी कम हो रही है। इसे बदलने के लिए बागवानों को नई वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाना होगा। किन्नौर को सेब की पैदावार की दृष्टि से एक अग्रणी जिला बनाना होगा।