नाथपा झाकड़ी परियोजना की ओर से अर्जित भूमि गुज्जर समुदाय और बाहरी लोगाें को देने पर ग्रामीण खफा
विस्थापित गांव कोटला में गुज्जर समुदाय और दूसरे परिवारों के बसाने का मामला एसडीएम ने उपायुक्त शिमला को भेजा
प्रशासनिक तौर पर 28 परिवारों को कोटला में बसाने की चल रही प्रक्रिया
ग्रामीणों के विरोध के बाद एसडीएम ने प्रक्रिया पर लगाया विराम, डीसी को कार्रवाई के लिए लिखा
संवाद न्यूज एजेंसी
ज्यूरी (रामपुर बुशहर)। नाथपा झाकड़ी परियोजना के लिए अर्जित की गई भूमि पर सबसे पहला अधिकार विस्थापितों का है। विस्थापित ग्रामीणों की कोटला की खाली जमीन पर गुज्जर समुदाय और दूसरे लोगों को बसाने की योजना का मामला विरोध के बाद एसडीएम ने उपायुक्त शिमला को भेज दिया है।
बीते दिनों एसडीएम कार्यालय रामपुर में एसडीएम हर्ष अमरेंद्र सिंह और राजस्व विभाग के कर्मचारियों के साथ ज्यूरी पंचायत के उप प्रधान अरुण शर्मा की अगुवाई में विस्थापित कल्याण समिति कोटला की इस मामले पर विस्तार से चर्चा हुई। प्रशासन ने बताया कि रामपुर उपमंडल के 28 भूमिहीन गुज्जरों और दूसरे परिवारों को कोटला में जमीन देने की प्रक्रिया चल रही है। बैठक में विस्थापित परिवार परियोजना के लिए अर्जित खाली जमीन विस्थापित परिवारों को ही देने की मांग पर अड़े रहे। विस्थापित कल्याण समिति कोटला के प्रधान कृष्ण लाल वर्मा और सचिव धर्मसेन मेहता ने बताया कि ग्रामीण अपनी मांग पर अडिग है। कोटला की खाली जमीन गुज्जर समुदाय और दूसरे लोगों को देने का विरोध जारी रखेंगे। मुद्दे को जल्द सचिव राजस्व के समक्ष भी रखा जाएगा। जल्द ही एक प्रतिनिधिमंडल शिमला जाएगा। उन्होंने बताया कि सरकार ने 1990 में 1500 मेगावाट की नाथपा झाकड़ी जल विद्युत परियोजना की कॉलोनी बनाने के लिए उनकी सारी जमीन और मकान अर्जित कर विस्थापित किया है। अब उनसे अर्जित जमीन को उन्हें वापस न देकर बाहर से गुज्जर समुदाय और बाहरी लोगों को यहां बसाने की तैयारी कर रहे हैं, जो कोटला के विस्थापित परिवारों के साथ नाइंसाफी है। बाहरी लोगों को बसाकर उनकी अर्जित जमीन, जलस्रोत, घासनी और पेड़-पौधे भी उनसे छीनने की तैयारी की जा रही है। हिंदू गांव में गुज्जर समुदाय को बसा कर शांति भंग होने की पूरी आशंका बनी रहेगी और उनके मवेशी विस्थापितों के पशुपालन व्यवसाय को भी चौपट करेंगे। झाकड़ी परियोजना की कॉलोनी के लिए कोटला गांव के विस्थापितों की 1990 में करीब 300 बीघा कृषि योग्य जमीन और दर्जनों परिवारों के घर अर्जित किए गए थे। सतलुज जल विद्युत परियोजना ने जिस प्रयोजन के लिए जमीन अर्जित की गई थी, उस प्रयोजन के लिए मात्र 100 बीघा जमीन ही उपयोग में लाई गई, बाकी बची करीब 200 बीघा जमीन सरकार ने अपने नाम ली। उसमें सरकार ने राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए भी जमीन तकनीकी शिक्षा विभाग के नाम कर दी। अन्य बची जमीन में गुज्जर समुदाय और दूसरे बाहर के लोगों को देने की तैयारी की जा रही है। जबकि परियोजना की कॉलोनी के प्रयोजन से बची जमीन पर विस्थापितों का हक बनता था। ग्रामीणों ने सरकार से आग्रह किया जमीन कोटला के विस्थापितों को वापस दी जाए। गुज्जर समुदाय और दूसरे लोगों को कोटला की जगह दूसरी जगह बसाया जाए।
उप प्रधान अरुण शर्मा ने बताया कि पंचायत की ओर से भी एसडीएम से आग्रह किया गया है कि कानू व कटोलू में गुज्जर समुदाय और बाहरी लोगों को बसाया जाए। कोटला में परियोजना के लिए अर्जित खाली पड़ी जमीन विस्थापितों को ही दी जाए।