अमर उजाला ब्यूरो
रोहड़ू।
क्षेत्र रोहड़ू में हर साल बागवानों को अप्रमाणित सेब के पौधे बेचकर ठगी की जाती है। लेकिन इस पर उद्यान विभाग शिकंजा नहीं कस पा रहा है। उनके खिलाफ नाममात्र कार्रवाई की जाती है। इसके बाद अप्रमाणित पौधे बेचने वाले फिर सक्रिय हो जाते हैं। विभाग इसे गंभीरता से नहीं ले रहा, जिसका नुकसान बागवानों को उठाना पड़ता है। रोहड़ू बाजार में सड़क के किनारे अप्रमाणित पौधे सरेआम बिक रहे हैं, जो विभागीय अधिकारियों को नहीं दिखाई दे रहे हैं। यहां पर प्रमाणित नर्सरी के कागज दिखाकर अप्रमाणित पौधे बेचे जा रहे हैं। कई बागवान भी बार-बार कहने के बावजूद जागरूक नहीं हो रहे।
पौधों की बढ़ती मांग को देखकर कुछ कारोबारी पंजीकृत नर्सरी के दस्तावेज दिखाकर बाहर से पौधे मंगवा कर सड़क पर बेच रहे हैं। पंजीकृत नर्सरी के नाम पर बाहर से पौधे खरीद कर बाजार में शिकड़ी पुल के पास बिक रहे हैं। परिणामस्वरूप अप्रमाणित पौधों में खराब फल लगते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र रोहड़ू के प्रभारी एवं बागवानी विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र कायथ ने बागवानों से आह्वान किया कि सेब व अन्य पौधे को पंजीकृत नर्सरी से अपने सामने निकलवा कर ही खरीदें। पौधों के साथ नर्सरी मालिक से उसकी वैरायटी के साथ-साथ पक्का बिल जरूर लें। अप्रमाणित व खराब पौधे लगाने से बागवानों को नुकसान उठाना पड़ेगा।
यह है पौधे बेचने का नियम
हिमाचल प्रदेश नर्सरी एक्ट के तहत किसी भी फल की नर्सरी का पहले उद्यान विभाग से पंजीकरण करवाना जरूरी है। फिर तैयार नर्सरी में विभाग की टीम समय-समय पर बीमारी की जांच करती है। बीमारी से ग्रस्त व खराब पौधों को नर्सरी में नष्ट करना होता है। इसके बाद पौधों की बिक्री भी नर्सरी में की जाती है। गैर प्रमाणित नर्सरी बेचने वालों के खिलाफ एक्ट में कानूनी कार्रवाई का प्रधान है।
बिल नहीं दे रहे, पौधे रोग ग्रस्त
नियमों को ताक पर रख कर शिकड़ी पुल के साथ सड़क के किनारे 100 से 150 रुपये तक सेब का प्रति पौधा बिक रहा है। बेचे जा रहे पौधे की किस्म का कोई अता पता नहीं है। इसका बिल नहीं दिया जा रहा और जड़ों में कई बीमारियों भी देखने को मिल रही है।
बाजार में पौधे बेचने वालों पर हर साल कार्रवाई की जाती है। पिछले साल हजारों पौधों को मौके पर जला कर क्षतिग्रस्त किया गया। इस साल भी नजर रखी जा रही है। यदि दोबारा बाजार में अप्रमाणित पौधे बिक रहे तो उनके खिलाफ तुरंत कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
गोबिंद सिंह झोबटा
एसएमएस, उद्यान विभाग