सांगला (किन्नौर)। जनजातीय जिला किन्नौर की समृद्ध लोक संस्कृति में बौद्ध धर्म के हिसाब से मनाए जाने वाले लोसर मेले की अपनी ही एक अलग पहचान है। बौद्ध कैलेंडर के हिसाब से हर वर्ष दिसंबर और जनवरी माह में पूह खंड की 24 पंचायतों में अलग-अलग तिथियों पर एक अलग अंदाज में लोसर मेला मनाया जाता है। मेले को मनाने का मूल उद्देश्य आपसी भाईचारे को बढ़ाना होता है। सब मिलकर नए साल का गर्मजोशी के साथ स्वागत करते हैं।
पूह खंड की रोपा, ज्ञाबुंग और सुन्नम पंचायतों में हजारों ग्रामीण इस विषेश मेले को धूमधाम से मना रहे हैं। लोसर मेले के पहले दिन वीरवार को सुख शांति के लिए गांव के हर घर की छत पर बौद्ध मंत्र युक्त झंडे लगाए। मेले के दूसरे दिन शुक्रवार को गांव के हर घर में बाड़ी दु ओगला और फाफरे के चिल्टे, घी और विभिन्न प्रकार की सब्जियां और अन्य पकवान बनाए जाएंगे। तीसरे दिन गांव के लोग एक साथ मिलकर तोशिम कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इस दौरान गांव में एक-दूसरे को बुलाकर खूब मेहमानबाजी का दौर चलता है। चौथे और पांचवें दिन रौपावैली की ईष्ट देवी मां दुर्गा, सुन्नम गांव के ईष्ट देवता युलसा नारायण और ज्ञाबुंग गांव के ईष्ट देवता दुंबर बारा साउनी के मंदिर प्रांगण में प्रत्येक गांव से ग्रामीण सुबह से ही किन्नौरी पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर नाटी डालने के लिए पहुंच जाते हैं। यह कार्यक्रम देर रात तक चलता है। पांच दिनों तक चलने वाले इस विशेष पर्व लोसर के दौरान सुबह के समय चूहे का मिलना शुभ और लड़ाई झगड़े को अशुभ माना जाता है। रोपावैली के छैवांग नेगी, दावा नेगी, अमरीक नेगी, अश्वनी नेगी आदि ने कहा कि हर वर्ष की तरह इस बार भी लोसर मेला धूमधाम से मनाया जा रहा है।