याचिकाकर्ता सुरेंद्र कुमार राज्य सरकार की हिमकेयर योजना के लाभार्थी हैं। उनको दिल की बीमारी के चलते पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती होना पड़ा था। वहां उनके दिल में कोरोनरी स्टंट डाले गए थे। इस इलाज के दौरान उनका खर्च 2,70,604 रुपये आया। हिमकेयर कार्ड धारक होने के नाते याचिकाकर्ता को पूरी तरह मुफ्त इलाज मिलना चाहिए था। लेकिन राज्य सरकार द्वारा योजना के तहत अस्पताल को समय पर भुगतान न करने के कारण पीड़ित को यह भारी-भरकम राशि मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में बेहद मुश्किल से अपनी जेब से भुगतनी पड़ी। जब याचिकाकर्ता ने बार-बार गुहार लगाने के बाद थक-हारकर 12 दिसंबर 2025 को एच.पी. स्वास्थ्य बीमा योजना सोसायटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को कानूनी नोटिस भेजा, तो विभाग ने 2 फरवरी 2026 को अपने जवाब में यह स्वीकार किया कि मरीज की 2.70 लाख की यह क्लेम राशि पूरी तरह वैध है।
प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर कॉमन काडर नीति के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंच गए हैं। उन्होंने याचिका दायर कर राज्य सरकार की ओर से 30 मार्च 2026 को लाई नीति का विरोध किया है। असिस्टेंट प्रोफेसरों ने कहा कि इस नीति के चलते डॉक्टरों की वरिष्ठता प्रभावित होगी। वहीं, उनके तबादलों पर असर पड़ेगा। इस नीति के तहत असिस्टेंट प्रोफेसर अपने ही जूनियर के जूनियर हो जाएंगे। याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि सरकार इस नीति को लागू करना चाहती है, तो इसे भविष्य में नई नियुक्तियों पर लागू कर सकती है।
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई की। सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने राज्य सरकार सहित सभी विभागों को नोटिस जारी किए हैं। खंडपीठ ने सभी पक्षों से चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। इसके साथ ही अंतरिम आवेदन पर भी नोटिस जारी किया गया है। मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में बताया गया है कि वर्ष 2008 की नीति के तहत हिमाचल प्रदेश के मेडिकल कॉलेज आईजीएमसी और टांडा में असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए अलग-अलग काडर बनाए गए थे। वर्ष 2015 में जब नए मेडिकल कॉलेज खोले गए, तब भी उनके लिए अलग-अलग काडर बनाए गए थे।