जैसे ही जिले में बागवानी और नकदी फसलों की ओर लोगों का रुझान बढ़ता गया, तब से घराट का वजूद खतरे में पड़ना शुरू हो गया था। इससे परंपरागत कृषि करने वाले किसानों की संख्या में भी काफी गिरावट आई और घराट में पिसाई के लिए अनाज न मिलने से ये घराट वीरान पड़ने लगे, रही सही कसर आपदा ने पूरी कर दी। लिहाजा, अब जिला में करीब 500 घराट ही बचे हैं, जिनमें चालू हालत में महज 200 के करीब ही बच पाए हैं। ये घराट उन क्षेत्र के नालों में हैं, जहां अभी भी गेंहूं, मक्की, जौ, कादरा, सलियारा, काउणी, चीणी आदि परंपरागत अनाज की खेती हो रही है और इन नालों में काफी लंबे अरसे से कोई बाढ़ नहीं आई।
बीते तीन वर्षों में बाढ़ के कारण तबाह हुए घराटों की बात करें तो वर्ष 2023 की बाढ़ ने सैंज की पिन पार्वती, पार्वती, ब्यास, सहित अन्य नालों में आई बाढ़ ने 415 घराट तबाह किए थे। जबकि वर्ष 2024 में भी जिलाभर के नदी-नालों में आई बाढ़ से 28 घराट नष्ट हुए थे। इस बार आई आपदा में 8 घराट का वजूद खत्म हो गया।
तीन साल में 451 घराट बाढ़ की भेंट चढ़े हैं। इसमें सबसे ज्यादा वर्ष 2023 की आपदा में नष्ट हुए थे। राजस्व विभाग ने इसकी वर्ष के हिसाब से रिपोर्ट तैयार की है।- गणेश ठाकुर, जिला राजस्व अधिकारी