कीरतपुर से नैरचौक तक प्रस्तावित फोरलेन सड़क से जहां हजारों लोग बेघर होंगे, वहीं ‘देवी-देवता’ के मंदिर भी उजड़ेंगे। ‘देवी-देवताओं’ के लगभग दो दर्जन मंदिर इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की जद में आ रहे हैं। एक कब्रिस्तान और गुरुद्वारा भी इसकी रेंज में आया है। नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया के सर्वेक्षण में इसका खुलासा हुआ है।
कीरतपुर से नैरचौक तक फोरलेन सड़क निर्माण की औपचारिकताएं लगभग पूरी कर ली गई हैं। भू अधिग्रहण के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को जिम्मेवारियों सौंपी गई हैं। अप्रैल से कार्य शुरू करने की योजना है। भू-अधिग्रहण की प्रक्रिया में 1000 से अधिक मकान आ रहे हैं।
पुख्ता सूत्रों के मुताबिक फोरलेन के लिए कल्लर का गुरुद्वारा, पलथीं का कब्रिस्तान सर्वे की रेंज में है। कनैड़ के तीन, चौक का एक, जड़ोल के तीन, रोपड़ी का एक मंदिर समेत करीब दो दर्जन मंदिर इस दायरे में आ रहे हैं। कनैड़ चौक के समीप बने शिकारी माता के मंदिर का कुछ हिस्सा भी सड़क की जद में है।
कब्रिस्तान को दूसरी जगह देंगे भूमि
नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया के प्रोजेक्ट डायरेक्टर सतीश कौल ने कहा कि लोगों के मकानों के साथ मंदिर भी सर्वे रेंज में हैं। अधिकतर मंदिर सरकारी भूमि पर बने हैं। जो सड़क बनने वाली जगह से बाहर होंगे, उन्हें छेड़ा नहीं जाएगा। यदि कब्रिस्तान सड़क के हिस्से में आया तो इसके लिए दूसरी जगह दी जाएगी।
मंडी, बिलासपुर के मंदिर ज्यादा
फोरलेन की जद में आने वाले मंदिरों में अधिकतर मंडी और बिलासपुर के हैं। इनमें दुर्गा माता, शिवजी, गणेश, बालक महेश्वर भी शामिल हैं। हालांकि, विभाग के मुताबिक मंदिर सरकारी भूमि पर हैं। कुछ मंदिर ग्रामीण देवताओं के हैं तो कुछ किसी परिवार विशेष के।
विस्थापन के साथ फायदा भी होगा
फोरलेन से जहां लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ेगा, वहीं फायदा भी होगा। उस दायरे में आने वाले क्षेत्र की वैल्यू बढ़ना स्वभाविक है। नैरचौक से कीरतपुर तक की दूरी करीब 40 किमी कम होगी।
सड़क से पहले बने पुनर्वास की नीति
फोरलेन सड़क विस्थापित समिति के प्रधान रामसिंह, सचिव सदाराम शर्मा की अध्यक्षता में कुछ रोज पहले हुई बैठक में सड़क बनाने से पहले पुनर्वास को नीति बनाने की मांग उठाई गई है। उनका कहना है कि जमीन के बदले जमीन और मकान के बदले मकान चाहिए। पुनर्वास को अन्य जरूरी वस्तुएं भी उपलब्ध करवाई जाएं।