18 जुलाई को दूसरी बैठक हुई। आंतरिक जांच पड़ताल में 90 लोगों से बातचीत की और तथ्य जुटाए गए। शिकायतकर्ता अपनी तरफ से शिकायत बारे सबूत पेश नहीं कर पाए। उनकी ओर से पेश किए गए तथ्य झूठे पाए गए और जांच में पुख्ता नहीं निकले। कमेटी ने पाया कि शिकायतकर्ता व दूसरे पक्ष का आपसी झगड़ा हुआ था और मामला पुलिस तक पहुंचा था। इसी को दबाने के लिए ही रैगिंग का ड्रामा रचा गया था।
हैरानीजनक यह रहा कि शिकायतकर्ता पक्ष का कोई भी तथ्य सही नहीं पाया गया। जांच में यह भी सवाल खड़ा किया गया कि आखिर दो साल तीन महीने तक इस मामले की जानकारी प्रबंधन को क्यों नहीं दी गई। एक्ट के प्रावधानों के अनुसार रैगिंग की झूठी शिकायत पर नियमानुसार कार्रवाई की गई।
सूत्र बताते हैं कि 2023 में सीनियर प्रशिक्षु ने जूनियर प्रशिक्षु के नाम लाइब्रेरी से किताबें ली थीं। इसकी एवज में फीस नहीं दी और जूनियर पर जुर्माना लगता रहा। जूनियर एकत्रित होकर सीनियर के पास चले गए और मामला हाथापाई तक पहुंच गया। मामला पुलिस तक भी पहुंचा। इसी मामले को दबाने के लिए रैगिंग का खेल खेला गया, लेकिन जांच में यह सिरे नहीं चढ़ पाया और उल्टा शिकायतकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई अमल पर लाई गई। उधर, नेरचौक मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. डीके वर्मा ने बताया कि नियमानुसार मामले में कार्रवाई अमल पर लाई गई है।