मंडी। चौहार घाटी के राजबन में बादल फटने से प्रभावित हुए लोगों के लिए पड़ोसी गांव के लोग बड़ा सहारा बने हैं। वीरवार को प्रभावितों की रात भविष्य की चिंता और खौफ में ही गुजर गई। प्रभावित तबाही के मंजर को याद कर सिहर गए। हालांकि स्थानीय ग्रामीणों ने प्रभावितों को हौंसला दिया और उनके खाने-पीने व रहने का पूरा प्रबंध किया।
राजबन के साथ लगते गुराहला गांव में करीब 15 प्रभावित वीरवार रात को पहुंचे। जिनका पूरा ख्याल ग्रामीणों ने रखा। गुराहला गांव के शिव राम ने बताया कि प्रभावित घटना के बाद सहमे हुए हैं। उनके जहन में तबाही का मंजर है। वीरवार रात प्रभावितों को हौंसला भी दिया, लेकिन प्रभावितों की बातों में खौफ साफ झलका।
उन्होंने कहा कि प्रभावित भविष्य को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि उनके घर भी खतरे के जद में हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्हें दूसरी जगह ठहराया गया है। प्रभावित यही कह रहे हैं कि अब कहां जाएंगे और आगे क्या होगा? मलबे में लापता हुए लोगों को याद करते हुए भी प्रभावितों की आंखें नम हो गई।
शिव राम ने बताया कि मलबे में मिले दोनों बच्चे आर्यन और अमन राजबन से एक किमी की दूरी पर स्थित तेरंग में रहते थे। दोनों की माता घटना वाले दिन इसी जगह पर थीं। जबकि वह दोनों देने के चलते राजबन में अपने चाचा राम सिंह के पास रुक गए थे। इसी बीच बादल फटने से आपदा बरप पड़ी। इस घटना में दोनों बच्चे तो बच नहीं पाए, लेकिन उनका चाचा राम सिंह बच गया है।
अमन के पिता ज्ञान चंद बिरोजे का कार्य करता है और घटना की सूचना मिलने के बाद घर पहुंच गया है। वहीं, आर्यन के पिता खेम चंद लेह गया हुआ था। घटना की सूचना मिलने पर वह भी वापस लौट आया है। खेम चंद के मनाली पहुंचने की सूचना है। कलेजे के टुकड़े इस दुनिया में रहने से माता बेसुध हैं। जबकि पिता इस घटना पर ही यकीन कर पा रहे हैं।
पहले न कभी बाढ़ आई और न ही भूस्खलन हुआ
स्थानीय शिव राम कहते हैं कि चौहार घाटी के राजबन गांव में पहले कभी न तो बाढ़ आई और न ही कभी भूस्खलन हुआ। अचानक हुई घटना से सभी अचंभित हैं। ग्रामीण बादल फटने के बाद मलबे में ढेरों को देखकर घबरा रहे हैं। लोगों के घरों का नामोनिशान मिट गया है। शिव राम का कहना है कि प्रशासन का अब तक अच्छा सहयोग मिल रहा है। लापता लोगों की खोजबीन भी जारी है।