जोगिंद्रनगर से मंडी तक 35 साल बाद भी साकार नहीं हो पाया टू लेन का सपना
पठानकोट-मंडी हाईवे का दर्जा मिलने के बाद भी नहीं हुआ सड़क का विस्तार
संवाद न्यूज एजेंसी
जोगिंद्रनगर (मंडी)। जोगिंद्रनगर-मंडी हाईवे की सिंगल लेन सड़क पर तीखे और संकीर्ण मोड़ लगातार हादसों का कारण बन रहे हैं। बावजूद इसके सड़क के विस्तार को लेकर एनएचएआई गंभीर नहीं है। 1989 में पठानकोट-मंडी हाईवे का दर्जा मिलने के बाद भी घट्टा से मंडी सड़क का विस्तार नहीं हुआ। यही कारण है कि इस सड़क पर वाहन चलाने वाले चालकों ही नहीं, यात्रियों की जान पर भी जोखिम बरकरार है।
जोगिंद्रनगर में निजी स्कूल बस और ट्राले की भिड़ंत में मासूम बच्चों के घायल होने के बाद लोगों ने एनएचएआई की उदासीनता पर रोष जताते हुए कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। मंगलवार को शहर के अपरोच रोड में जिस तीखे मोड़ पर यह हादसा हुआ वह सड़क भी दो बड़े वाहनों के एक साथ गुजरने के लायक नहीं थी। आ कारण पेश आए हादसे में स्कूल बस के परखचे उड़ गए और ट्राला भी दुर्घटनाग्रस्त होकर सड़क किनारे ढांक में लुढक गया।
एनएचएआई के अधीन आने वाले इस मार्ग पर साल 2012 में गलू के समीप परिवहन निगम की एक बस गिर जाने से 13 यात्रियां की मौत हुई थी। जोगिंद्रनगर शहर के समीप ढेलू में भी निजी बस गिरने से 20 यात्री घायल हुए थे। उरला और कोटरोपी में सड़क के तीखे और संकीर्ण मोड़ पर आए दिन वाहन दुर्घटनाग्रस्त होते हैं।
मंडी से जोगिंद्रनगर कुल 56 किलोमीटर सड़क को पहले फोरलेन फिर टू लेन बनाने की तमाम औपचारिकताएं कई बार मुकम्मल भी हुईं, लेकिन हर बार निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है। पर्यटन सीजन में घट्टा से मंडी तक सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त हो रहे वाहनों ने एनएचएआई ने चुप्पी साध रखी है। खस्ताहाल सड़क का कुछ हिस्सा भले ही टारिंग से चकाचक हुआ है, लेकिन अभी भी तीखे और संकीर्ण मोड़ों में सुधार नहीं हुआ है।
17 करोड़ से होगा मार्ग की दशा में सुधार
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पठानकोट-मंडी हाईवे की सड़क को घट्टा से पधर तक सुधारने को लेकर अनुमानित 17 करोड़ रुपये की धनराशि मौजूदा समय में खर्च की जा रही है। वहीं, नारला से बिजनी तक टू लेन सड़क का निर्माण और बिजनी से मंडी तक तीन किलोमीटर टनल के निर्माण को लेकर भी विभागीय औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं। जोगिंद्रनगर से पधर तक टू लेन सड़क का निर्माण कार्य भी जल्द शुरू होगा। इसके लिए एनएचएआई के उच्चाधिकारी अपनी औपचारिकताओं को पूरा करने में जुटे हुए हैं।
-साहिल जोशी, साइट इंजीनियर, एनएचएआई