मंडी। आधुनिकता के दौर में आज कपड़ों विशेषकर दुपट्टों की रंगाई करने वाला रंगरेज (जिसे स्थानीय बोली में ललारी भी कहा जाता है) कपड़ा मिल कंपनियों और रेडीमेड कारोबार की वजह से बेरोजगार हो गया है। पहले सूट के रंग का दुपट्टा रंगाने के लिए रंगरेज दुकानों पर महिलाओं और युवतियों की भीड़ लगी रहती थी। मंडी में करीब 20 वर्ष पूर्व शादी समारोह और धार्मिक आयोजनों पर लोग पगड़ियां, दुपट्टे, शॉल, कोट और पेंट की रंगाई करवाते थे। आज केवल नियमित ग्राहक ही रंगरेज के पास पहुंचते हैं।
मंडी शहर के खत्री सभा के समीप कोटली क्षेत्र के लुहारड़ी निवासी रंगरेज हरदेव सिंह का कहना है कि आज के दौर में रंगाई कार्य शून्य हो गया है। शादी समारोहों में लहंगा-चोली पहनावे से भी रंगरेज कारोबार प्रभावित हुआ। 80 प्रतिशत लोगों ने रेडीमेड कपड़ों को अपनाया है। पहले शहर में 7 से 8 रंगाई की दुकानें हुआ करती थीं।
20 से 25 लोगों का रोजगार चलता था। अब शहर में एक मात्र रंगरेज की दुकान है। आज शादी और अन्य आयोजनों पर पहने जाने वाले साफे, पगड़ी सीधे कपड़ा मिल से ग्राहकों तक पहुंचते हैं। पहले पगड़ी को तैयार करने के लिए रंगरेज को मेहनत करने पर मात्र 20 से 30 रुपये मिलते थे। दुपट्टा रंगाई पर 8 से 10 रुपये दिए जाते थे। आज दुपट्टा रंगाई करने पर 65 रुपये लिए जाते हैं लेकिन काम ज्यादा नहीं है। ऐसा ही रहा तो आने वाले दिनों में लोग रंगरेज को भूल जाएंगे।