जोगिंद्रनगर में काष्ठ शैली के मंदिर के निर्माण के दौरान शिल्पकार राम लाल के द्वारा उकेरी गई अद्
शिल्पकला को फिर से जीवंत करने के लिए अब तीसरी पीढ़ी ने संभाला है जिम्मा
संवाद न्यूज एजेंसी
जोगिंद्रनगर (मंडी)। प्रदेश में विलुप्त हो रही काष्ठ कला को सहेजने में मंडी जिला के शिल्पकार रामलाल फिर पुरातन संस्कृति को नया स्वरूप दिलाने के लिए अहम योगदान दे रहे हैं। छोटी काशी मंडी, देवनगरी कुल्लू और पर्यटन स्थल मनाली में विलुप्त हो रही काष्ठ कला को फिर से जीवंत करने के लिए तीसरी पीढ़ी ने जिम्मा संभाला है।
इन दिनों मंडी के जोगिंद्रनगर में अराध्य देव गहरी के काष्ठ शैली मंदिर में काम कर रहे बालीचौकी के जैहरा गांव से संबंध रखने वाले शिल्पकार राम लाल ने बताया कि प्रदेश की संस्कृति को जीवित रखने के लिए काष्ठ कला का सबसे बड़ा योगदान रहा है। इसे सहेजने वाले कलाकार अब न के बराबर रह गए हैं। बताया कि इस कला को छोड़कर अब अन्य व्यवसाय में पलायन कर रहे कलाकारों को सरकार की ओर से प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। काष्ठ कला को प्रदर्शित करने में प्रतिदिन दस घंटे भी मेहनत कर रहे हैं।
शिल्पकार राम लाल ने बताया कि देवदार की लकड़ी से हिमाचल के देवी-देवताओं की मूर्तियां, पशु, पक्षियों के अलावा अलग-अलग प्रकार के फूल की अद्भुत झलक भी उनकी शिल्पकला से देखने को मिलती है। मंडी जिला के पधर के सराहन, उरला में देव पशाकोट, चौहारघाटी में फूंगणी माता मंदिर, रहनगलू में बाल कामेश्वर और कुल्लू जिला में उनकी ओर से नार सिंह समेत 30 से अधिक काष्ठ शैली के मंदिर बनाए हैं। काष्ठ शैली की कला को जीवंत रखने के लिए वह बीते 18 सालों से कड़ी मेहनत कर रहे हैं। बताया कि उन्होंने शिल्पकला से 20 लोगों को रोजगार भी दिलाया है।