मंडी। सियाचिन में बलिदान हुए सदोह पंचायत के जलाैन गांव के जवान नवल किशोर का शव जैसे ही गांव पहुंचा, चीख पुकार मच गई। तिरंगे में लिपटे बेटे की पार्थिव देह देखकर माता-पिता तो बेसुध हो गए।
उन्हें अन्य परिजनों और लोगों ने ढाढ़स बंधाया लेकिन वे भी अपनी आंखों से आंसू नहीं रोक पाए। पूरा गांव गमगीन हो गया। इससे पहले जलौन पहुंचने पर स्थानीय लोगों और व्यापारियों ने सेना के वाहनों पर फूल चढ़ाए।
साथ ही भारत माता की जय, नवल किशोर अमर रहे और जब तक सूरज चांद रहेगा, नवल तेरा नाम रहेगा के नारे लगाए। उनकी अंतिम यात्रा में सैकड़ों की संख्या में लोगों का हुजूम उमड़ा। सियाचिन से उनके पार्थिव शरीर को लेकर आए सेना के उच्च स्तर के अधिकारियों और सेना की टुकड़ी ने बलिदानी को सशस्त्र सलामी दी। गांववासियों ने भी बलिदानी सपूत को नम आंखों से अंतिम विदाई दी।
परिवार से दूसरा बलिदानी
कोटली उपमंडल की पंचायत सदोह के गांव जलौन में भगत राम के परिवार में 53 साल में यह दूसरा बलिदान है। नवल किशोर के पिता के चाचा कृष्ण सिंह ने 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश के लिए बलिदान दिया था। सदोह पंचायत के प्रधान देवी राम और बुजुर्ग ज्योति प्रकाश बताते हैं कि कृष्ण सिंह शादी के महज तीन माह बाद ही देश के लिए बलिदानी हो गए थे। उनके भी परिवार में कोई बच्चा नहीं है। बलिदानी जवान नवल किशोर की शादी भी डेढ़ साल पहले ही हुई थी। नवल किशोर के पिता भगत सिंह मिस्त्री का काम करते हैं।
nनवल किशोर से प्रेरणा लेने वाले दोस्तों ने बताया कि अकसर जब भी वह घर आया करते थे तो युवाओं को भर्ती के बारे में बताते थे। किसी ने नहीं सोचा था कि इतनी कम उम्र में वह बलिदानी हो जाएंगे। बलिदानी के भाई झारखंड के रांची में सेना में कार्यरत सुनील ने बताया कि दोनों दोस्त की तरह रहते थे। अकसर योजना बनाकर घर पर छुट्टी आते थे। पूरा परिवार एक साथ घूमने जाता था। एक सप्ताह पहले उनकी नवल से बात हुई थी। तब उसने खुद को तंदुरुस्त बताया था।
22 दिन में जिले का तीसरा जवान बलिदानी
देश की सरहदों की रक्षा करते हुए जिले में यह तीसरा बलिदान है। इससे पहले 11 नवंबर को जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में आतंकी मुठभेड़ में बल्ह उपमंडल की छम्यार पंचायत के बरनोग गांव के नायब सूबेदार राकेश कुमार 42 साल की उम्र में बलिदान हो गए थे।
14 नवंबर को सदर उपमंडल के बग्गी तुंगल गांव के 42 वर्षीय हवलदार सुरेश कुमार लेह लद्दाख में डयूटी के दौरान बलिदान हो गए थे।