पहाड़ी और ढलानदार इलाकों में बागवानों के लिए फलों को बगीचे से सड़क तक पहुंचाना बड़ी चुनौती रहता है। कई जगह बागवानों को पीठ पर बोझ उठाकर या मजदूरों की मदद से फसल सड़क तक पहुंचानी पड़ती है। अब इस समस्या को तकनीक के जरिए कम करने की तैयारी है।
सुंदरनगर के पलौहटा में जल्द ही हिमाचल प्रदेश की पहली बागवानी मोनो रेल दौड़ती नजर आएगी। एचपी शिवा परियोजना के तहत एशियन डेवलपमेंट बैंक के सहयोग से तैयार किए जा रहे इस पायलट प्रोजेक्ट में 300 मीटर ट्रैक का निर्माण पूरा हो चुका है। मोनो रेल का सफल परीक्षण भी किया जा चुका है। पहले चरण में कुल एक किलोमीटर ट्रैक तैयार किया जा रहा है। इसके संचालन के बाद पहाड़ी और ढलानदार बगीचों में तैयार फलों को सड़क तक पहुंचाने में बागवानों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
फल ही नहीं, खाद और पौध भी पहुंचाएगी मोनो रेल
मोनो रेल का इस्तेमाल सिर्फ फलों की ढुलाई तक सीमित नहीं रहेगा। इसके जरिए खाद, बीज, पौध और अन्य कृषि आदानों को भी बगीचे से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जा सकेगा। इससे बागवानों को फसल या कृषि सामग्री पीठ पर उठाकर ले जाने की जरूरत कम होगी। साथ ही ढुलाई में लगने वाले श्रम और समय में भी कमी आने की उम्मीद है। खासकर ऐसे बगीचों में इसका फायदा अधिक होगा, जो सड़क से ऊंचाई पर या काफी ढलान पर स्थित हैं। इन क्षेत्रों में फलों को नीचे सड़क तक पहुंचाने में बागवानों को सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है।
सफल परीक्षण से बागवानों में उत्साह
फल उत्पादक एवं विपणन संघ पलौहटा-2 क्लस्टर के अध्यक्ष मुनीश शर्मा ने कहा कि मोनो रेल का काम शुरू होने और इसका परीक्षण सफल रहने से क्षेत्र के बागवानों में उत्साह है। उन्हें उम्मीद है कि परियोजना शुरू होने के बाद फलों की ढुलाई आसान होगी और मेहनत भी कम होगी।
आईआईटी मंडी ने तैयार की व्यवहार्यता रिपोर्ट
बागवानी विभाग के अनुसार इस परियोजना को शुरू करने से पहले आईआईटी मंडी की टीम ने तकनीकी व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार की थी। रिपोर्ट के आधार पर ही पलौहटा में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। बागवानी विभाग मंडी के उपनिदेशक डॉ. संजय गुप्ता ने बताया कि इस परियोजना के अनुभव और परिणामों के आधार पर प्रदेश के अन्य बागवानी क्लस्टरों में भी मोनो रेल स्थापित करने की योजना पर काम किया जाएगा। अगर पलौहटा में यह व्यवस्था सफल रहती है तो पहाड़ी क्षेत्रों में बागवानी उत्पादों की ढुलाई के पारंपरिक तरीकों का एक तकनीकी विकल्प तैयार हो सकता है। इससे बागवानों की मेहनत कम करने के साथ फसल को समय पर सड़क तक पहुंचाने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।