मंडी में इंदिरा मार्केट के छात पर दिवाली त्यौहार के लिए लगी दुकानों से वारीदारी करने को उमडी भी
मंडी। छोटी काशी के नाम से मशहूर मंडी में दिवाली के अवसर पर स्थानीय उत्पाद हाथोंहाथ बिक रहे हैं। मकोल और लोस्टी की मांग अधिक देखी जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में आंगन की लिपाई और पूजा में इन दोनों को इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा ताजे फूलों, फूल मालाओं, मिट्टी से बने दीये, मोमबाती और अन्य साजो सामान की बिक्री से अच्छी खासी कमाई हो रही है।
स्थानीय उत्पाद बेचकर ग्रामीण लाखों रुपये की कमाई करते हैं। जंगलों में लाल रंग की विशेष मिट्टी और जमीन में दबी चूना मिट्टी को लाकर इनके पेड़े तैयार कर बाजारों में 20-20 रुपये में बेचा जा रहा है। स्थानीय उत्पाद के बाजार मंडी में सज गए हैं। गेंदे के बड़े फूलों से तैयार एक माला 150 से 200 रुपये तक बेची जा रही है। जबकि गेंदे के छोटे फूलों की एक माला 100 से 150 रुपये तक बिक रही है। वहीं, लिपाई-पुताई के लिए लोस्टी और मकोल के पेड़े 20-40 रुपये में बेचे जा रहे हैं। जबकि घास से तैयार किया गया घिरसू 50 से 80 रुपये तक बेचा जा रहा है।
दिवाली पर्व में दीपों को तैयार करने और उनमें रंग रोगन के बाद 40 से 60 रुपये दर्जन और बिना रोगन लगाए 20 से 30 रुपये दर्जन दाम से बेचा जा रहा है। दिवाली से दो दिन पूर्व नगर निगम ने ग्रामीणों को सेरी मंच और इंदिरा मार्केट के ऊपर कतारों में दुकानें सजाने की अनुमति दी है। स्थानीय निवासी हेमराज, दलीप चंद, संजय, रूकमणी, पूजा, निर्मला, सनी और दिनेश आदि ने बताया कि हर वर्ष दीपावली के दौरान घिरसू, फूल मालाएं, मोमबाती, कलेंडर, दीये और सजावटी सामान बेचकर अच्छी खासी कमाई कर लेते हैं। दिवाली पर्व का बेसब्री से इंतजार रहता है। इस कार्य में परिवार के अन्य लोग भी सहयोग करते हैं। बड़े कारोबारियों की अपेक्षा छोटे कारोबारी भी अच्छी आमदनी अर्जित कर लेते हैं। लोग भी परंपरागत चीजें खरीदने में रूचि दिखा रहे हैं। नगर निगम आयुक्त एचएस राणा ने बताया कि दिवाली से दो दिन पूर्व लोगों को सेरी मंच और इंदिरा मार्केट के ऊपर दुकानें सजाने की अनुमति दी जाती है। इसकी एवज में सामान और जगह के अनुसार 500 से 1,500 रुपये तक की पर्ची काटी जाती है।