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Groundwater Crisis: आईआईटी मंडी की रिसर्च में बड़ा खुलासा, धान की खेती ने पंजाब का भूजल संकट बढ़ाया

Sun, 02 Aug 2026 02:51 PM IST
Ankesh Dogra राकेश राणा, मंडी।

सार

आईआईटी मंडी के वैज्ञानिकों के 20 वर्षीय अध्ययन में पंजाब में भूजल संकट को लेकर गंभीर तथ्य सामने आए हैं। शोध के अनुसार धान आधारित खेती और भूजल के लगातार दोहन से कई जिलों में भूजल भंडारण तेजी से घटा है, जबकि सिंचाई योग्य पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि मौजूदा खेती और सिंचाई व्यवस्था में बदलाव नहीं किया गया तो भविष्य में जल संकट और गहरा सकता है।
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आईआईटी मंडी - फोटो : संवाद
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विस्तार
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पंजाब का भूजल तेजी से खत्म हो रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह बारिश में कमी नहीं, बल्कि धान आधारित खेती और सिंचाई के लिए भूजल का लगातार बढ़ता दोहन है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के 20 वर्षों के अध्ययन में यह महत्वपूर्ण खुलासा हुआ है। शोध के अनुसार यदि खेती के मौजूदा ढर्रे और सिंचाई व्यवस्था में बदलाव नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में राज्य के कई हिस्सों में सिंचाई के साथ-साथ पेयजल का भी गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

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आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग की शोधार्थी हरसिमरनजीत कौर रोमाना, अमेरिका की चैपमैन यूनिवर्सिटी के प्रो. रमेश पी. सिंह और आईआईटी मंडी के प्रो. डेरिक्स प्रेज शुक्ला ने वर्ष 2000 से 2020 तक के भूजल, वर्षा, भूजल भंडारण और कृषि संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया। यह अध्ययन 13 जुलाई को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल एडवांसेस इन स्पेस रिसर्च में प्रकाशित हुआ है।
 

अध्ययन में पाया गया कि दो दशकों के दौरान पंजाब में वर्षा में कोई उल्लेखनीय दीर्घकालिक कमी दर्ज नहीं हुई, लेकिन सिंचाई के लिए भूजल का दोहन लगातार बढ़ता गया। इससे साफ हुआ कि मौजूदा भूजल संकट प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि मानवजनित गतिविधियों का परिणाम है। शोधकर्ताओं के अनुसार धान की खेती के लगातार विस्तार और ट्यूबवेलों के जरिए बड़े पैमाने पर भूजल निकासी ने जलस्तर को तेजी से नीचे धकेल दिया है।
 

शोध के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम पंजाब के मुक्तसर, बठिंडा, फिरोजपुर, मानसा और मोगा जिले सबसे अधिक प्रभावित हैं। वर्ष 2015 के बाद भूजल भंडारण में गिरावट और तेज हुई तथा 2018 से 2020 के बीच कई इलाकों में जलस्तर सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। बठिंडा, पटियाला, संगरूर, बरनाला, लुधियाना, जालंधर और मोगा में भूजल भंडारण में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि सिंचाई योग्य भूजल की गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है। सोडियम एडसॉर्प्शन रेशियो (एसएआर) के आधार पर अनुपयुक्त क्षेत्रों की संख्या वर्ष 2000 में 13 थी, जो 2020 में बढ़कर 20 हो गई। वहीं, सोडियम प्रतिशत के आधार पर यह संख्या 12 से बढ़कर 47 तक पहुंच गई। इसका अर्थ है कि राज्य के कई इलाकों में भूजल न केवल कम हो रहा है, बल्कि खेती के लिए उसकी गुणवत्ता भी तेजी से खराब होती जा रही है।
 
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आंकड़ों का विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के 315 भूजल नमूनों, नासा के वर्षा संबंधी आंकड़ों और उपग्रह आधारित भूजल भंडारण के आंकड़ों का विश्लेषण किया। सिंचाई योग्य भूजल की गुणवत्ता का मूल्यांकन अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि धान की एक फसल के लिए 3,000 से 5,000 घनमीटर प्रति हेक्टेयर तक पानी की आवश्यकता होती है। वर्षों से सिंचाई के लिए बड़े पैमाने पर ट्यूबवेलों से पानी निकाला जा रहा है, जबकि भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण उसी गति से नहीं हो पा रहा। यही असंतुलन आज पंजाब के भूजल संकट की सबसे बड़ी वजह बन गया है।

कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने, भूजल संरक्षण तकनीकों को अपनाने और सिंचाई प्रणाली में सुधार किए बिना पंजाब के भूजल संकट को रोकना संभव नहीं होगा। यह अध्ययन टिकाऊ कृषि और भूजल प्रबंधन की नीतियां बनाने में महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकता है। - प्रो. डेरिक्स प्रेज शुक्ला, प्रोफेसर, आईआईटी मंडी
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