करसोग ममेल में बूढी दिवाली मनाते हुए लोग। स्त्रोत- जागरूक पाठक
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करसोग (मंडी)। ममेल में स्थित ऐतिहासिक ममलेश्वर महादेव मंदिर में बूढ़ी दिवाली पारंपरिक, आस्था और उल्लास के साथ संपन्न हुई। बूढ़ी दिवाली की सबसे विशिष्ट झलक गूरों का जलते अंगारों पर नृत्य रहा। मार्गशीर्ष अमावस्या की रात्रि को आयोजित इस दिव्य उत्सव में हजारों श्रद्धालुओं ने शिरकत कर देव संस्कृति की इस अनोखी परंपरा का साक्षात अनुभव किया।
मंदिर के पुजारी अरविंद और स्थानीय जनपद की परंपराओं के गहन अध्ययन में पारंगत नीपू भारद्वाज के अनुसार बूढ़ी दिवाली हिमाचल की प्राचीन देवसंस्कृति की प्रतीक है, जिसे कार्तिक दिवाली के एक माह बाद मनाया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस दिवाली का पहला निमंत्रण देव ‘अलैड़ी/ड़ैढी’ को दिया जाता है। दूसरे दिन जब हलयाड/अलैड मंदिर से पहली खुंबली पहुंची तो कारदार, शहनाई वादक, ढोल-नगाड़े और ग्रामीणों ने नृत्य करते हुए अगवानी की। हाथों में जलती मशालें आकर्षण का केंद्र बनी रहीं। दूसरी खुंबली काणी मंदलाह से पहुंची, जहां पुरानी मान्यता है कि प्राचीन समय में बिजली न होने पर लोग जोगठी/जगणी की मशालों से मंदिर तक जाते थे और यह परंपरा आज भी जारी है।
मंदिर के पीछे सड़क पर दोनों देवशक्तियों देव ‘अलैड़ी/ड़ैढी’ और नाग कजौणी का मिलन कराया गया। इसके बाद मंदिर परिसर में अलाव (धूना) प्रज्वलित किया गया। धूने के लिए अदनेश्वर, अन्नपूर्णा माता और लयाड मंदिर से विशेष रूप से लकड़ी लाई गई। देव-समिति के सदस्य दो दलों में बांटकर शृंखला बनाते हैं और बीच में जलते अलाव को मंदराचल पर्वत का प्रतीक मानकर “दिवाली करो दिवाली” के जयकारों के बीच एक-दूसरे की शृंखला तोड़ने का प्रयास करते हैं। सुकेत संस्कृति के विद्वान डॉ. हिमेंद्र बाली के अनुसार बूढ़ी दिवाली का संबंध ऋग्वैदिक नागाधिपति वृत, इंद्र बलि प्रसंग और समुद्र-मंथन की कथा से है। यही प्रसंग यहां लोकनाट्य रूप में जीवंत होता है। संवाद