पधर (मंडी)।पुरातन समय से चली आ रही परंपरा द्रंग क्षेत्र में आज भी पाईंदल ऋषि के हार भ्रमण के रूप में जीवंत है। दावा है कि पाईंदल ऋषि सरहद में सैनिकों की रक्षा करते हैं। इन दिनों द्रंग क्षेत्र के आराध्य देव पाईंदल ऋषि इसी हार में भ्रमण पर हैं। इन दिनों द्रंग और गुम्मा की पंचायतों का भ्रमण देव कर रहे हैं। पाईंदल ऋषि घर-घर दस्तक देकर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दे रहे हैं। देव समाज में सबसे बड़ी हार के अधिष्ठाता देव पाईंदल ऋषि हर तीन वर्ष के बाद अपने हार भ्रमण पर निकलते हैं। देवता ने अपने हार भ्रमण को चार हिस्सों में बांटकर रखा है। देव पाईंदल ऋषि देव बूढ़ा बिंगल ऋषि के सबसे छोटे टीका हैं। डोलरा गांव में खजूर के घने पेड़ों की ओट में पाईंदल ऋषि का विशाल भव्य मंदिर है और मंदिर के ठीक नीचे देवता का सरोवर है, जो भी श्रद्धालु मंदिर आते हैं, दोनों जगह देवता के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।
यह है मान्यता
देवता के पुजारी मस्त राम, गूर महेश कुमार, भंडारी शेर सिंह, सचिव हेम सिंह ठाकुर, मंदिर कमेटी प्रधान जगदीश कुमार ठाकुर, पुजारी जय राम, लालमन ठाकुर, युद्ध चंद राणा, पवन कुमार, परम देव, सुरेंद्र कुमार, रंगीला राम आदि कारदारों ने बताया कि देव पाईंदल ऋषि सरहद में तैनात सैनिकों की रक्षा के लिए खड़े होते हैं, जबकि क्षेत्र की सुख शांति और खुशहाली के लिए सदा आशीर्वाद बनाए रखते हैं।
15 दिसंबर को शुरू हुआ था हार कार्यक्रम
देव पाईंदल ऋषि का हार कार्यक्रम 15 दिसंबर को शुरू हुआ था। पुजारी ने बताया कि जनवरी के अंत तक देवता का हार कार्यक्रम समाप्त होने के आसार हैं। कटौला, कटिंडी, तरयांबली, शिलग, टांडू,, पाली, कुन्नू, पधर, गवाली, उरला से होते हुए देवता का रथ जोगिंद्रनगर क्षेत्र की गुम्मा पंचायत में पहुंच चुका है। इसके बाद देवता का रथ बाकी छूटे हुए हुए गांवों का भ्रमण करते हुए अपने मंदिर में प्रवेश करेगा। पुजारी ने बताया कि लोहड़ी पर्व के बाद देवता के मंदिर लौटते ही मंदिर में विशाल महागायत्री यज्ञ का आयोजन होगा। मंदिर में विश्व शांति के लिए हर वर्ष महायज्ञ का आयोजन किया जाता है।
वर्ष में दस दिन भी मंदिर में नहीं होता रथ
देवता का रथ वर्ष में दस दिन भी अपने मंदिर नहीं होता। बड़ीहार होने के कारण लोग रोजाना किसी समारोह पर देवता को दावत पर अपने घर बुलाते हैं। इस क्रम के चलते हार भ्रमण को भी बीच में स्थगित करना पड़ता है। देव पाईंदल ऋषि की लोगों में विशेष आस्था है, जिसके चलते वर्ष भर देवता हार भ्रमण पर रहते हैं। ऐसे में अधिकांश सैनिक परिवार देवता को अपने अपने घर न्योता देकर आशीर्वाद पाते हैं। अगले वर्ष देव का हार कार्यक्रम किसी अन्य इलाका में होना तय हो गया है।