सुंदरनगर (मंडी)। हिमाचल में देव नियमों से देवलू या आम लोग ही नहीं बल्कि उनके साथ चलने वाले बजंतरी भी बंधे हुए हैं। भले ही बंजतरियों के बिना देवता एक कदम नहीं चलते हों, लेकिन उन्हें देवता को स्पर्श करने का अधिकार नहीं है। यहां तक कि जब वह अपने देवता के साथ किसी आतिथ्य में जाते हैं तो वहां पर भी उन्हें अलग स्थान पर बिठा कर अलग बर्तनों में खाना खिलाया जाता है। देवता मेले में करीब पांच सौ सालों से इसी प्रथा का चलन आज भी है।
उधर, सुकेत कारदार संघ के प्रधान अभिषेक सोनी ने कहा कि मेलों में छुआछूत की प्रथा को बंद कर दिया गया है। मेलों में लगने वाले लंगरों में सभी एक साथ बैठकर खाना खाते हैं। देव समाज के प्रयासों से छुआछूत के मिटाया जा रहा है। जहां तक बजंतरियों का आराध्य देव के चरण स्पर्श न करने का मामला है इसके पीछे तर्क है कि बंजतरी जिन वाद्य यंत्रों को बजाते हैं वह चमड़े से बने होते हैं। चमड़े को शुद्ध नहीं माना जाता। जरूरी नहीं है कि निम्न जाति के लिए ही यह नियम है। अगर कोई उच्च जाति का भी इन वाद्य यंत्रों को बजाता है तो उसे भी आराध्य देव के चरण स्पर्श नहीं करने दिए जाते।