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अपढ़ता नहीं आढ़े आई, कामयाबी में जगह बनाई

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पढ़ने का नहीं मिला मौका, मेहनत से हासिल किया मुकाम
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दस वर्षों से स्वयं सहायता समूह के जरिये कमला बनीं सशक्त
परिवार चलाने के साथ 10 और महिलाओं को दिया रोजगार
नीलम मेहता
मंडी। अनपढ़ता आढ़े नहीं आती, जब मन में कुछ कर गुजरने की ललक हो तो कामयाबी अपने आप जगह बना लेती है। ये शब्द किन्नौर जिला की कमला नेगी पर स्टीक बैठते हैं। कमला नेगी बिल्कुल अनपढ़ है और दस वर्ष से अपना सौली माता के नाम से स्वयं सहायता समूह चलाकर न केवल अपने परिवार का पालन पोषण कर रही हैं, बल्कि दस अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं।
थुनाग में गरीब घर में पैदा हुई कमला ने जिला किन्नौर में शादी की है, वहां भी गरीबी होने के कारण वह अपने पति महेंद्र के साथ रोजगार की तलाश में 35 वर्ष पूर्व मंडी जिला के लिए निकली थी। अपने स्वयं सहायता समूह के कारण ही कमला ने आज अपनी पहचान बनाई है। कमला कहती हैं कि उसे मुकाम हासिल करने के लिए हर मोड़ पर ठोकरें और मुश्किलें आई और जिंदगी में संघर्ष शुरू हुआ। हर समय एक नई चुनौती सामने आकर खड़ी हो जाती थी। कभी पेट की तो कभी रहने की और कभी बच्चों की पढ़ाई की। बीमारी की चिंता ने परिश्रम करना सिखाया। कभी सब्जी बेची तो कभी रात दिन स्वेटर, जुराबें और सिलाई-कढ़ाई का काम किया। कभी पैसे-पैसे को मोहताज रहीं कमला आज अपना स्वयं सहायता समूह चलाती हैं। जिंदगी के उतार-चढ़ाव के बावजूद कामयाबी आपके कदम चूमती है। कहती हैं कि वे आज एक कामयाब महिला हैं, उसके पीछे उसका परिश्रम और परित्याग मुख्य वजह है। उनका कहना है कि महिलाओं को अपनी छवि को निखारने के लिए अपने परिवार की नींव का पत्थर बनना होगा। कमला हर शुक्रवार और शनिवार को सेरी मंच पर स्टॉल लगाती हैं। वह अपने हाथों से स्वेटर, बैग, जुराबें, अचार और अन्य खाद्य सामग्री तैयार कर बेचती हैं।
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... जब बेटा बीमारी के कारण नहीं रहा
कमला नेगी के दो बच्चे थे, लेकिन बेटा बीमारी के कारण नहीं रहा। बेटी मुस्कान जमा दो की पढ़ाई कर रही हैं। वे कहती हैं कि गरीबी ने मुझे हर कार्य करना सिखाया है। किराये के मकान में रहती थीं, लेकिन पांच वर्ष से वह सौलीखड्ड में अपने घर में रह रही हैं। वह कहती है कि महिलाओं को घर परिवार में सामजस्य बिठना और अपने करियर के लिए श्रेष्ठतम विकल्प का चुनाव करना होगा। जीवन में कई चुनौतियां आती हैं, फिर भी नारी को हर जगह अपनी भूमिका निभानी पढ़ती है। ऐसे में उम्मीद का दामन कभी नही छोड़ना चाहिए।
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बच्चों के कॅरियर के लिए मां की मेहनत
कमला का कहना है कि अपने बच्चे को बचाने के लिए उसने घर-घर जाकर सब्जी बेची। तमाम कोशिशों के बावजूद भी वह अपने 16 वर्षीय बेटे को नहीं बचा सकी। मगर अपनी मेहनत से वह आगे बढ़ी है आज वह अपनी आर्थिकी से मजबूत है लेकिन कमी है तो सिर्फ बेटे की। पालन पोषण की तलक ने मुझे इस मुकाम तक पहुंचाया है। गरीबी ने आगे बढ़ने को प्रेरित किया है।
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