मंडी। छोटी काशी मंडी के देव समागम में देव पराशर ऋषि का विशेष स्थान है। देव और मानस के इस समागम में सोने और चांदी के सजे सैकड़ों देवताओं के रथ पहुंचते हैं। लेकिन, देव पराशर ऋषि का खारा (मोहरा) शिवरात्रि महोत्सव में नहीं आता है। देव की छड़ी और सूरज पंख ही शिवरात्रि में शिरकत करते हैं। इसके साथ ही पराशर ऋषि शाही जलेब में भी शिरकत नहीं करते हैं और इन्हें नरोल का देवता भी माना जाता है। स्नोर की 22 पंचायतों में ऋषि के आठ जगह मूल स्थान हैं।
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ऋषि का खारा केवल दो उत्सवों में निकलता है बाहर
देवता के गूर भाग सिंह ने बताया कि ऋषि का खारा केवल दो उत्सवों में अपने मूल स्थान से बाहर निकलता है। मंदिर के मूल स्थान से खारा निकालने की प्रक्रिया बहुत ही कठिन है। ऋषि को उत्सव में ले जाने के लिए पुजारी को कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। देव पराशर ऋषि का खारा पंचमी और काशी मेले के लिए मंदिर से बाहर निकलता है।
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शिवरात्रि महोत्सव में राजा के बेहड़े में करते हैं वास
देवता कमेटी के प्रधान बलवीर ठाकुर ने कहा कि राजाओं के समय से ही पराशर ऋषि शिवरात्रि महोत्सव के दौरान राजा के बेहड़े में ही विराजमान होते हैं और शाही जलेब में शिरकत नहीं करते है। रियासतकालीन समय में राजा शिवरात्रि महोत्सव में हर दिन स्वयं ऋषि की बेहड़े में ही पूजा किया करते थे।
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