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देव आस्था के महाकुंभ में शान से निकली माधोराय की दूसरी जलेब

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- फोटो : अमर उजाला
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मंडी। देव आस्था के महाकुंभ में महाशिवरात्रि उत्सव में राजदेवता माधोराय की दूसरी जलेब रविवार को धूमधाम से निकली। पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर झूमते सिराज के लोगों की नाटी जलेब में हर किसी के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी। जलेब में मधुर शहनाई की गूंज से छोटी काशी में माहौल देवमय हो गया। राजदेवता समेत कुल 28 प्रमुख देवताओं ने जलेब में शिरकत की। आईपीएच मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर ने राजदेवता माधोराय के मंदिर में पूजा अर्चना करने के बाद जलेब में शिरकत की।
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माधोराय की दूसरी जलेब की अगुवाई रियासतकालीन देवताओं में गुरु और चेले के रूप में विख्यात देव छमाहूं और देव झांजणू ने की। मंडी सिराज के इन देवताओं में देव छमांहू को शेषनाग का रूप माना जाता है। जबकि देव छांजणू को महाभारतकालीन घटोत्कच का स्वरूप माना जाता है। दोनों देवताओं की अगुवाई में मंडी रियासतकालीन शिवरात्रि की जलेब निकाली जाती है। रविवार को माधोराय के मंदिर से निकली जलेब में ढोल-नगाड़ों की ताल पर नाचते गाते देवलू भी शामिल हुए। वहीं छमाहूं और छाजणूं के बाद इसके छमाहू नागू बग्गी, मार्कंडेय सरौल, घटोत्कच, देव विष्णु मतलोड़ा सिराज, देव चपलांदू नाग, देव बायला, देव जमलू, देवी अंबिका डाहर, देव शैटी नाग डाहर, देव बिट्ठू नारायण थाची, बड़ादेयो हुरंग नारायण, देव पशाकोट, देव घड़ौनी, देव पेखर का गहरी, देवी महामाया, ब्रह्मदेव तुंगासी, देव चुंजबाला, देवी अंबिका नाऊ माधोराय की पालकी के ठीक आगे चल रही थी। जबकि शुकदेव ऋषि थटा, शुकदेव ऋषि सारटी, देव झाथी वीर, देव गणपति, देव सरीहटू, देव टूंडी वीर और देव शेष नाग माधोराय की जलेब में शामिल हुए। राज देवता माधोराय की जलेब की परंपरा रियासत काल से चली आ रही है। जिसमें पुलिस के घुड़सवार, पुलिस, होमगार्ड के जवान, पुलिस बैंड के अलावा विभिन्न झांकियां भी जलेब के दौरान निकाली जाती रही हैं।

रियासतकाल में राजा हाथी पर सवार होकर जलेब में करते थे शिरकत
रियासतकाल में निकलने वाली शाही जलेब की बात ही कुछ और होती थी। माधोराय की इस जलेब में राजा भी हाथी पर सवार होकर शामिल होते थे। रविवार को निकली माधोराय की दूसरी जलेब को देखने के लिए सड़क के दोनों ओर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। इस बार करीब तीन दशक बाद चौहारघाटी के देवता मेले में शिरकत कर रहे हैं। इन देवों के रथ की शैली भी मेले में आकर्षण का केंद्र बनी रही।
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