जोगिंद्रनगर (मंडी)।लगभग 40 सालों से उहल तृतीय चरण चूल्हा विद्युत परियोजना का सपना देख रही जोगिंद्रनगर की जनता का सपना अभी पूरा होने की गारंटी नहीं है। इसे तंत्र की नालायकी कहें या फिर कुछ और। तय समय से लगभग 11 साल पीछे चल रही इस परियोजना का कार्य अभी भी अधूरा है। प्रबंधन दावा कर रहा है कि इस परियोजना की एक मशीन जून माह के अंत तक अपना विद्युत उत्पादन शुरू कर सकती हैं। जबकि इसके बाद दूसरी मशीन अगस्त तक और तीसरी विद्युत मशीन सितंबर या अक्तूबर तक विद्युत दोहन शुरू कर सकती है। लेकिन, लंबे अरसे से दावों को हकीकत में बदलने के प्रयास विफल हो रहे हैं।
यह होना है लाभ
यदि यह विद्युत परियोजना जल्द ही विद्युत उत्पादन करना शुरू कर देती है तो इससे प्रदेश को लगभग 100 करोड़ की आमदनी प्रति वर्ष होगी। वहीं, बिजली संकट से भी निजात मिलनी थी। उहल तृतीय चरण चूल्हा परियोजना 100 मेगावाट की है। इसमें लगभग दस मेगावाट अतिरिक्त उत्पादन करने का भी प्रावधान किया है। जिसके तहत पीक सीजन में इस परियोजना से लगभग 110 मेगावाट तक का विद्युत उत्पादन किया जा सकता है। परियोजना की एक मशीन से लगभग 33.3 मेगावाट का उत्पादन शुरू हो पाएगा।
हजारों करोड़ बढ़ गई लागत
बताया जा रहा है कि इस परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य 2007 तक तय किया गया था। तब इसकी लागत लगभग 500 करोड़ आंकी गई थी। लेकिन, इसके तय समय सीमा के भीतर पूरा न होने के कारण इस की लागत बढ़ते बढ़ते लगभग 1500 करोड़ हो चुकी है।
तारीख पर तारीख
राजनेता इस परियोजना को पहले मार्च माह, फिर अप्रैल और हाल ही में आए विद्युत मंत्री ने इसमें उत्पादन मई माह तक शुरू करने की बात कही थी। लेकिन, सूत्रों की मानें तो शायद यदि सब ठीक रहा तो जून माह के अंत तक ही एक मशीन शुरू हो सके। जिसमें 33.3 मेगावाट उत्पादन दोहन शुरू हो पाएगा। हालांकि विभाग ने इसके उत्पादन के लिए परियोजना में 33.3 मेगावाट की तीन मशीनें लगाई हैं। जिसमें से विभाग ने दो मशीनों को उत्पादन के लिए तैयार कर लिया है। लेकिन, कुछ एक खामियों के चलते इन्हें दुरुस्त करने में कुछ समय लग रहा है।
प्रबंध निदेशक ने किया दौरा
ब्यास वैली पावर कारपोरेशन विद्युत परियोजना के प्रबंधक निदेशक एसएस चौहान ने बुधवार को परियोजना स्थल का दौरा किया। उन्होंने माना कि इस परियोजना को लागू करना एक चैलेंज है। टनल को बनाने के लिए एक ही पहाड़ को लगभग 9 किमी लंबा खोदकर निकाला गया और टनल में भारी मात्रा में पानी के रिसाव के कारण इसमें काम करना बेहद मुश्किल है। दूसरी समस्या इस टनल के भीतर आने-जाने के रास्ते के थी। कोई अन्य मार्ग भी उपलब्ध नहीं था। जिसका किसी आपात स्थिति में उपयोग किया जा सके । कहा कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय में कई मामले लंबित होने के कारण भी इस परियोजना में देरी हुई। पर्यावरण मंत्रालय से एक एनओसी अभी कुछ दिन पहले ही प्राप्त हुआ है। इस मौके पर एमडी चंद्र शमशेर सिंह चौहान, एसई अजय विक्रांत इलेक्ट्रिकल, एडिशनल एसई राजीव शर्मा, एक्सईएन अमित ठाकुर, सुरजीत ठाकुर, एसडीओ अशोक, जेई मनोज और संदीप भी उपस्थित रहे।
दो के परीक्षण सफल
परियोजना के अधीक्षण अभियंता विद्युत अजय विक्रांत ने कहा कि इस परियोजना में 33.3 मेगावाट की तीन विद्युत इकाइयां स्थापित की गई हैं। जिनमें से दो इकाइयों का पूर्ण परीक्षण कर लिया गया है। वह सुचारु रूप से अपना कार्य करने के लिए तैयार हैं। तीसरी इकाई को सुचारु करने के लिए एक से दो माह तक का समय लग सकता है।