वहीं, इस त्रासदी में जिनकी जान बच गई है, अब वे जीने के लिए संघर्ष का पहाड़ चढ़ रहे हैं। जो परिवार पक्के मकानों में रहते थे, अब टेंट में रहने को मजबूर हैं। रहने के लिए ठिकाना इनकी सबसे बड़ी चिंता है। आंखों में आंसू लिए हर पीड़ित अब असमंजस में है कि आगे क्या होगा? ग्राउंड जीरो पर हालात ये हैं कि कई घर हवा में लटके हैं। बिजली-पानी की व्यवस्था ध्वस्त हो गई है, जिसे धीरे-धीरे बहाल किया जा रहा है। कई लोगों ने अपने घर छोड़ दिए हैं। जो बचे हैं, उन्होंने राहत शिविरों में शरण ली है।
खरपतवार नाशक के छिड़काव से घास और झाड़ियां जड़ समेत जल जाती हैं। इससे मिट्टी कमजोर हो जाती है और क्षरण होता है, जो बरसात में भूस्खलन का कारण बनता है। - सुरेंद्र कश्यप, डीएफओ नाचन
आपदा में हमारे चार घर बह गए। अभी तक कुल 25 हजार रुपये की राहत राशि मिली है। अब धार गांव में किराये के कमरे में रह रहे हैं। आय का कोई साधन नहीं बचा है। किराया देने के लिए भी पैसे नहीं हैं। रिश्तेदार ही अब सहारा हैं। प्रशासन की तरफ से मिला राशन भी कोई दूसरा ही ले गया है। - माहेश्वर सिंह, निवासी चांगणी लेहथान
पर्यावरण से छेड़छाड़ किसी भी तरह से सही नहीं है। डंपिंग साइट का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। सराज में किया गया जबरन विकास अब भारी साबित होने लगा है। यह आपदा पूरी तरह से मानवीय चूक से हुई है। इससे सबक लेने की जरूरत है। आपदा के बाद राशन की बंदरबांट भी हुई है। इसकी निगरानी करना जरूरी है। - भूप सिंह, सेवानिवृत्त सीएचटी, निवासी शिकावरी
40 साल पहले थुनाग तहसील वाले क्षेत्र में दर्जनों घराट व कूहलें होती थीं। इन्हें बेचकर यहां अब घनी आबादी बस गई है। इस आबादी को दूसरी जगह बिना भूमि बसाना चुनौतीपूर्ण है। भूमि कहीं भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में स्थानीय लोगाें की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। - मोहर सिंह, निवासी थुनाग बाजार