आज की युवा पीढ़ी किताबों से दूर भाग रही है। वह किताबों को भी इंटरनेट के माध्यम से मोबाइल पर ही पढ़ना चाहती है। जबकि, वास्तविकता यह है कि मोबाइल पर 24 मिनट से ज्यादा मोबाइल पर बातें करना और देखना घातक है। अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर मुख्यातिथि बद्दी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. महावीर ने कहा कि किताबों की दुनिया अनूठी है। मोबाइल पर ही उसका तोड़ ढूंढना काफी कठिन है।
जिस भवन में मोबाइल टॉवर लगे होते हैं, उस भवन या आसपास रहने वालों को सौ फीसदी कैंसर होने का अंदेशा बना रहता है। जीवी पंत के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जेसी कुनियाल ने पर्यावरण संतुलन के बारे में बताया। इस अवसर पर कुल्लू कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नंद लाल शर्मा की शोध पर आधारित पुस्तक का विमोचन भी किया गया। शोध करने वाले छात्रों ने अपने अनुभव को साझा किया। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. दयानंद गौतम ने कहा कि आज के दौर में इस तरह के सेमिनार होने से हिंदी की विधाएं जीवंत हो जाती हैं।
दो दिन तक आयोजित इस संगोष्ठी में देश और विदेश के 73 विद्वानों ने अपने पर्चे पढ़े। संगोष्ठी में सबसे अधिक शोध मोहन राकेश के आधे-अधूरे नाटक पर पढ़े गए। पुड्डुचेरी विश्वविद्यालय के भूषण उहाला ने कहा कि वह अपने आप को सौभाग्यशाली मान रहे हैं कि उन्हें कुल्लू आने के लिए बेशक तीन दिन लगे, लेकिन कुल्लू पहुंचकर व संगोष्ठी का हिस्सा बनकर गदगद हो गए हैं। इस अवसर पर प्रो. रेखा शर्मा, डॉ. रूपा ठाकुर, डॉ. पुष्पा शासनी, प्रो. लीना वैद्य आदि मौजूद रहे।